दिल्ली की राजनीति में इन दिनों विकास, महंगाई या कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि वीडियो क्लिप, एडिटिंग सॉफ्टवेयर और फॉरेंसिक रिपोर्ट सबसे बड़े मुद्दे बन गए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी की नेता आतिशी के कथित बयान को लेकर जो घमासान मचा है, वह साफ दिखाता है कि सत्ता की लड़ाई अब विधानसभा की बहसों से निकलकर व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी और ट्विटर ट्रेंड तक पहुँच चुकी है।
मामले की गंभीरता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि दिल्ली विधानसभा ने पंजाब पुलिस के तीन शीर्ष अधिकारियों—DGP, स्पेशल DGP (साइबर क्राइम) और जालंधर पुलिस कमिश्नर—को नोटिस भेज दिया। वजह? विधानसभा की “संपत्ति” यानी एक वीडियो क्लिप का इस्तेमाल और उसी के आधार पर FIR दर्ज करना।
अब सवाल यह नहीं रह गया है कि वीडियो एडिटेड था या नहीं, बल्कि असली सवाल यह है कि राजनीति में नैरेटिव कौन तय करेगा—विधानसभा या राज्य पुलिस?
10 दिन की मोहलत: जवाब या समय खरीदने की चाल?
पंजाब पुलिस अधिकारियों ने जवाब देने के लिए 10 दिन की मोहलत माँगी है। कागज़ों में इसे “प्रक्रियात्मक आवश्यकता” कहा जा रहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे समय खरीदने की रणनीति माना जा रहा है। आखिर जब दावा है कि वीडियो “छेड़छाड़ किया हुआ” है, तो फिर जवाब देने में पूरे 10 दिन क्यों?
दिल्ली विधानसभा स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने इस पूरे घटनाक्रम को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताते हुए कहा कि इससे सदन की गरिमा को ठेस पहुँची है। विडंबना यह है कि भारतीय राजनीति में गरिमा का जिक्र अक्सर तभी होता है, जब सत्ता दूसरी तरफ हो।
FIR: कानून का पालन या राजनीतिक हथियार?
जालंधर पुलिस द्वारा कपिल मिश्रा और अन्य बीजेपी नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज करना इस पूरे प्रकरण को और भी दिलचस्प बना देता है। आरोप है कि आतिशी का वीडियो एडिट कर सोशल मीडिया पर फैलाया गया।
अब सवाल उठता है—
क्या यह सच में धार्मिक भावनाओं की रक्षा का मामला है,
या फिर राजनीतिक विरोधियों को सबक सिखाने की एक और कड़ी?
स्पीकर गुप्ता का यह आरोप कि पंजाब में AAP सरकार राज्य पुलिस का “दुरुपयोग” कर रही है, कोई नई बात नहीं है। भारत की राजनीति में पुलिस का इस्तेमाल अक्सर कानून लागू करने से ज़्यादा संदेश देने के लिए होता रहा है—और यह मामला उसी पुरानी स्क्रिप्ट का नया संस्करण लगता है।
BJP बनाम AAP: वीडियो से वर्चस्व की जंग
बीजेपी और आम आदमी पार्टी—दोनों ही इस वीडियो को लेकर एक-दूसरे पर हमलावर हैं। बीजेपी इसे आतिशी द्वारा गुरु तेग बहादुर के अपमान का मुद्दा बता रही है, जबकि AAP इसे झूठ, एडिटिंग और प्रोपेगेंडा करार दे रही है।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान का यह कहना कि सोशल मीडिया पर झूठ फैलाया जा रहा है, अपने आप में एक तीखा व्यंग्य है—क्योंकि आज की राजनीति में सोशल मीडिया सच से ज़्यादा ताकतवर हथियार बन चुका है।
निष्कर्ष: लोकतंत्र या राजनीतिक तमाशा?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम सचमुच लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बचा रहे हैं, या फिर उन्हें राजनीतिक अखाड़ा बना चुके हैं?
जब विधानसभा, पुलिस, फॉरेंसिक रिपोर्ट और सोशल मीडिया—सब राजनीति के मोहरे बन जाएँ, तो जनता के हिस्से में सिर्फ तमाशा देखने की मजबूरी ही बचती है।
और शायद यही आज की भारतीय राजनीति का सबसे कड़वा, लेकिन सबसे सटीक सच भी है।














