Wednesday, February 11, 2026
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‘प्रतिशोध’ की भाषा समाज को बांट सकती है, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण: NSA डोभाल के बयान पर महबूबा मुफ्ती की कड़ी प्रतिक्रिया

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के हालिया बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा और रणनीति से जुड़े सर्वोच्च पद पर बैठे अधिकारी द्वारा ‘प्रतिशोध’ जैसे शब्दों का प्रयोग बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे समाज में नफरत व ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिल सकता है।

महबूबा मुफ्ती ने कहा कि जिन लोगों की जिम्मेदारी देश को आंतरिक और बाहरी खतरों से सुरक्षित रखने की है, उनसे संयमित और जिम्मेदार भाषा की अपेक्षा की जाती है। 21वीं सदी में इतिहास की पीड़ाओं के नाम पर बदले की भावना को उभारना देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।

अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाए जाने की आशंका

महबूबा मुफ्ती ने चेतावनी देते हुए कहा कि इस तरह के बयान गरीब और कम पढ़े-लिखे युवाओं को भावनात्मक रूप से उकसा सकते हैं। इसका परिणाम यह हो सकता है कि वे गुस्से और गलतफहमी के चलते उस अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाएं, जो पहले से ही सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि सत्ता और संस्थानों से निकलने वाली भाषा का असर ज़मीनी स्तर पर बहुत गहरा होता है।

किस संदर्भ में आया बयान?

दरअसल, NSA अजीत डोभाल ने शनिवार को ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के उद्घाटन समारोह में युवाओं को संबोधित करते हुए इतिहास, सभ्यता और राष्ट्रीय चेतना पर बात की थी। अपने भाषण में उन्होंने ‘प्रतिशोध’ यानी बदला शब्द का उल्लेख करते हुए कहा था कि यह शब्द भले ही आदर्श न लगे, लेकिन इसमें एक बड़ी शक्ति निहित है।

अजीत डोभाल ने अपने भाषण में क्या कहा?

डोभाल ने कहा कि केवल सपने देखने से जीवन नहीं बनता, लेकिन सपने व्यक्ति और समाज को दिशा जरूर देते हैं। जब सपनों को ठोस निर्णयों में बदला जाता है, तभी सफलता हासिल होती है। उन्होंने कहा कि आज भारत के युवाओं में अपार ऊर्जा और क्षमता है और वे एक स्वतंत्र भारत में पैदा हुए हैं, लेकिन यह स्वतंत्रता सहज रूप से नहीं मिली।

उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि भारत के इतिहास में ऐसे दौर आए हैं, जब लोगों को फांसी दी गई, गांव जलाए गए, सभ्यता को नुकसान पहुंचाया गया और धार्मिक स्थलों को लूटा गया। उन्होंने कहा कि उस समय हम बेबस होकर यह सब देखते रहे। उनके अनुसार, यह इतिहास आज की पीढ़ी के सामने एक चुनौती पेश करता है और हर भारतीय युवा के भीतर उस अन्याय के खिलाफ चेतना और आत्मबल होना चाहिए।

डोभाल ने यह भी कहा कि ‘प्रतिशोध’ शब्द आदर्श नहीं है, लेकिन इतिहास से मिले घावों को भूल जाना उससे भी बड़ा खतरा है। उनके मुताबिक, हमें अपने अतीत से सीख लेते हुए देश को उस मुकाम तक ले जाना चाहिए, जहां अपने अधिकारों, विचारों और मान्यताओं के आधार पर एक मजबूत और महान भारत का निर्माण किया जा सके।

सभ्यता, सुरक्षा और इतिहास से सबक

NSA डोभाल ने भारत की प्राचीन सभ्यता का जिक्र करते हुए कहा कि भारत कभी आक्रामक नहीं रहा। हमने न तो किसी देश पर हमला किया और न ही लूटपाट के इरादे से बाहर गए। लेकिन उन्होंने यह स्वीकार किया कि हम अपनी सुरक्षा और आने वाले खतरों को समय रहते समझने में विफल रहे। इसी लापरवाही का परिणाम हमें इतिहास में भुगतना पड़ा।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हमने उन गलतियों से सबक सीखा है और क्या आने वाली पीढ़ियां इस इतिहास को याद रखेंगी। डोभाल के अनुसार, यदि भविष्य की पीढ़ियां इतिहास से मिले सबक भूल गईं, तो यह देश के लिए सबसे बड़ी त्रासदी होगी।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया

महबूबा मुफ्ती के बयान के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। विपक्षी दलों का एक वर्ग मानता है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को ऐसी भाषा से बचना चाहिए, जो समाज में विभाजन की भावना पैदा करे। वहीं, कुछ लोग इसे सांस्कृतिक आत्मबोध और ऐतिहासिक चेतना से जोड़कर देख रहे हैं।

यह विवाद एक बार फिर इस सवाल को केंद्र में ले आया है कि इतिहास की व्याख्या और उससे मिलने वाली सीख को सार्वजनिक मंचों पर किस तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्र निर्माण के साथ-साथ सामाजिक सौहार्द भी बना रहे।

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VIKAS TRIPATHI
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