भारत की न्याय व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां कानून की किताबें तो बराबरी की बात करती हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में तराजू साफ़ तौर पर झुका हुआ नज़र आता है। 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में एक्टिविस्ट और स्कॉलर उमर खालिद को एक बार फिर जमानत से वंचित किया जाना इसी दोहरे मापदंड की कड़वी मिसाल बन गया है।
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और PDP प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सवाल उठाया है कि आख़िर न्याय का पैमाना किसके लिए नरम है और किसके लिए लोहे का। उनका सवाल सीधा है—जब बलात्कार और हत्या का दोषी डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम बार-बार पैरोल पर बाहर आ सकता है, तो फिर एक ऐसा व्यक्ति, जो अब तक सिर्फ़ आरोपी है, उसे वर्षों तक जेल में क्यों रखा जा रहा है?
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने उमर खालिद और शरजील इमाम को यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया कि उनके खिलाफ UAPA के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। लेकिन यही अदालत इसी केस में पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे देती है। सवाल यह नहीं है कि कानून क्या कहता है—सवाल यह है कि कानून को किस नज़र से पढ़ा जा रहा है और किन पर सख़्ती दिखाई जा रही है।
महबूबा मुफ्ती का ट्वीट इस व्यवस्था पर एक सीधा प्रहार है। उन्होंने लिखा कि न्याय का तराजू अन्याय के बोझ से टूट रहा है। यह महज़ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस बेचैनी की आवाज़ है, जो आज देश के बड़े हिस्से में महसूस की जा रही है—जहां असहमति को अपराध और सवाल पूछने को साज़िश बना दिया गया है।
What a travesty of justice. On one hand Gurmeet Singh convicted for rape and murder continues to receive parole after parole. On the other Umar Khalid merely an accused yet to face trial has been languishing in jail for over five years & repeatedly denied bail by no less than the… pic.twitter.com/8b1kpiU2u5
— Mehbooba Mufti (@MehboobaMufti) January 5, 2026
उमर खालिद के शब्द इस पूरे तंत्र की क्रूरता को बेनक़ाब कर देते हैं। “अब जेल ही मेरी ज़िंदगी है”—यह कोई भावुक बयान नहीं, बल्कि एक ऐसे युवा की स्वीकारोक्ति है, जिसे बिना दोष सिद्ध हुए वर्षों से कैद में रखा गया है। ट्रायल शुरू होने से पहले ही सज़ा काटने की यह प्रक्रिया क्या न्याय है या फिर एक राजनीतिक चेतावनी?
यह मामला अब सिर्फ़ उमर खालिद का नहीं रह गया है। यह उस लोकतंत्र की परीक्षा है, जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है। जब दोषी खुले आसमान में सांस लेते हैं और आरोपी सलाखों के पीछे घुटते हैं, तब सवाल अदालत के एक आदेश का नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक-राजनीतिक व्यवस्था की आत्मा का होता है।
आज देश के सामने सवाल साफ़ है—
क्या कानून सबके लिए बराबर है, या फिर सत्ता के करीब होने से न्याय आसान हो जाता है और सवाल उठाने की कीमत सालों की कैद बन जाती है?














