पति-पत्नी का संबंध: पुण्य, उत्तरदायित्व और आत्मिक उन्नति का शास्त्रीय रहस्यहिंदू धर्म में पति-पत्नी का संबंध केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतर का आध्यात्मिक बंधन माना गया है। पत्नी को ‘अर्धांगिनी’ कहा गया है—अर्थात जो केवल देह से नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य और पुण्य में भी सहभागी हो।
लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म प्रश्न उठता है—
यदि पत्नी को पति के पुण्य का फल मिलता है, तो पत्नी के पुण्य का फल पति को क्यों नहीं मिलता?
इसी गूढ़ प्रश्न का समाधान वृंदावन के विख्यात संत पूज्य प्रेमानंद महाराज जी ने अपनी विशिष्ट तार्किक और शास्त्रसम्मत शैली में किया है।
पाणिग्रहण संस्कार: इस व्यवस्था की आध्यात्मिक नींव
महाराज जी बताते हैं कि इस रहस्य की जड़ विवाह के पाणिग्रहण संस्कार में छिपी है।
विवाह में पति, पत्नी का हाथ पकड़ते हुए यह वैदिक मंत्र बोलता है—
“गृह्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्विभासः।
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः॥” (ऋग्वेद 10.85.36)
भावार्थ:
“मैं तुम्हारा हाथ सौभाग्य और जीवनभर की रक्षा के लिए ग्रहण करता हूँ।
देवताओं की कृपा से हम दोनों गृहस्थ धर्म का पालन करें।”
महाराज जी समझाते हैं कि पाणिग्रहण के समय पति का हाथ नीचे और पत्नी का हाथ ऊपर होता है। इसका आध्यात्मिक संकेत यह है कि—
“आज से मैं तुम्हारे जीवन का समस्त भार, उत्तरदायित्व और संरक्षण अपने ऊपर लेता हूँ।”
इसी संकल्प के कारण पत्नी को पति के पुण्य में स्वाभाविक अधिकार प्राप्त होता है।
पत्नी को पति के पुण्य का फल क्यों मिलता है?
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं—
एक स्त्री अपना मायका, कुल, परिचय और सुविधा त्यागकर पति के जीवन में प्रवेश करती है। वह पति के लिए घर को धर्मस्थली बनाती है।
जब पति—
तीर्थ यात्रा करता है, दान-पुण्य करता है, यज्ञ, जप, व्रत या सेवा करता है तो उसके पीछे पत्नी का अदृश्य सहयोग, त्याग और व्यवस्था होती है। शास्त्र इसी भाव को संकेत करते हैं—
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।” (मनुस्मृति)
अर्थात जहाँ नारी सम्मानित होती है, वहाँ देवता वास करते हैं।
इसी कारण पति द्वारा अर्जित पुण्य का आधा भाग पत्नी को स्वतः प्राप्त हो जाता है।
पत्नी का पुण्य पति को क्यों नहीं मिलता? — सूक्ष्म भेद
यहीं महाराज जी एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अंतर स्पष्ट करते हैं।
यदि—पति अधर्मी है, भक्ति से विमुख है और पत्नी अकेले जप-तप, भजन और साधना कर रही है तो पत्नी का पुण्य पति को नहीं मिलेगा।क्योंकि भगवद्गीता स्पष्ट कहती है—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”(गीता 2.47)
और—
“न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।”(गीता 3.5)
अर्थात हर आत्मा अपने कर्मों का फल स्वयं भोगती है।
ऐसे में—पति अपने अधर्म के कारण दुर्गति को प्राप्त होता है जबकि पत्नी अपनी भक्ति के बल पर स्वयं का परम कल्याण कर लेती है हाँ, यदि पति स्वयं भजन करने वाला, धर्मनिष्ठ और ईश्वराभिमुख है, और पत्नी निस्वार्थ भाव से उसकी सेवा करती है, तो—पति के भजन का प्रताप पत्नी को तार देता है और पत्नी की सेवा पति के धर्म को पुष्ट करती है यहाँ सहयोग से उद्धार संभव है, लेकिन स्थानांतरण से नहीं। पुण्य साझा हो सकता है, पाप नहीं
महाराज जी आगे स्पष्ट करते हैं—
“पुण्य में तो हिस्सेदारी संभव है, लेकिन पाप का दंड पूरी तरह व्यक्तिगत होता है।”
शास्त्र कहते हैं—
“स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।” (गीता 18.46)
न पति पत्नी के पाप का फल भोगता है, न पत्नी पति के पाप का—जब तक वे एक-दूसरे के अधर्म में सहभागी न हों।
(महाराज जी की भावना में)
पति-पत्नी का संबंध अधिकार का नहीं, उत्तरदायित्व का है। पुण्य बाँटा जा सकता है, लेकिन भक्ति, मोक्ष और आत्मिक उन्नति केवल व्यक्तिगत साधना से ही मिलती है।














