वकीलों की दलील और लिखित प्रस्तुतियों के लिए तय हुई सख्त समय-सीमा
न्यायालय के कामकाज को अधिक सुगम बनाने और जल्द न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की है। इस नई SOP के तहत अदालत में पेश होने वाले वकीलों की मौखिक बहस और लिखित प्रस्तुतियों के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय कर दी गई है, जिससे मामलों की सुनवाई में अनावश्यक देरी पर रोक लग सके।
इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत सहित सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों ने एक सर्कुलर जारी किया है। यह SOP तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है।
सुनवाई से पहले देनी होगी बहस की समय-सीमा
नई SOP के अनुसार, नोटिस के बाद और नियमित सुनवाई वाले सभी मामलों में वरिष्ठ अधिवक्ता, बहस करने वाले वकील और एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड (AOR) को अपनी मौखिक बहस की प्रस्तावित समय-सीमा सुनवाई शुरू होने से कम से कम एक दिन पहले अदालत को बतानी होगी।
यह जानकारी सुप्रीम कोर्ट द्वारा AOR को पहले से उपलब्ध कराए गए ऑनलाइन उपस्थिति पर्ची पोर्टल के माध्यम से जमा की जाएगी।
लिखित दलीलें 5 पेज से अधिक नहीं
SOP में यह भी स्पष्ट किया गया है कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं सहित सभी बहस करने वाले वकील, अपने AOR या पीठ द्वारा नामित नोडल वकील (यदि कोई हो) के माध्यम से संक्षिप्त लिखित नोट या प्रस्तुति दाखिल करेंगे।
यह प्रस्तुति:
सुनवाई की तारीख से कम से कम तीन दिन पहले
दूसरे पक्ष को एक प्रति देने के बाद
अधिकतम पांच पृष्ठों तक सीमित होगी।
समय-सीमा का सख्ती से पालन अनिवार्य
शीर्ष अदालत के चार रजिस्ट्रार द्वारा हस्ताक्षरित परिपत्र में साफ कहा गया है कि सभी वकीलों को निर्धारित समय-सीमा का सख्ती से पालन करना होगा और अपनी मौखिक दलीलें तय समय में पूरी करनी होंगी।
सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाने के लिए लगातार संरचनात्मक सुधारों की दिशा में कदम उठा रहा है। हाल के दिनों में अदालत ने कई मामलों में न्याय में देरी को लेकर कड़ी टिप्पणियां भी की हैं।
सुप्रीम कोर्ट में 90 हजार से अधिक मामले लंबित
देश की न्यायिक प्रणाली पर बढ़ते बोझ की ओर इशारा करते हुए आंकड़े बताते हैं कि देशभर की अदालतों में 5.49 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। अकेले सुप्रीम कोर्ट में ही 90 हजार से ज्यादा केस पेंडिंग हैं।
सरकार भी यह स्वीकार कर चुकी है कि न्यायिक देरी के पीछे कई कारण हैं, जिनका सीधा असर लंबित मामलों की संख्या पर पड़ता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की नई SOP को न्याय व्यवस्था में सुधार की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।














