सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड की वन भूमि पर हो रहे खुलेआम अवैध कब्ज़ों को लेकर बेहद सख़्त टिप्पणी की है। अदालत ने उत्तराखंड सरकार और उसके अधिकारियों की निष्क्रियता पर गहरी नाराज़गी जताते हुए कहा कि यह हैरान करने वाला और चिंताजनक है कि वन भूमि पर अतिक्रमण उनकी आंखों के सामने होता रहा और प्रशासन मूक दर्शक बना रहा।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस मामले में राज्य सरकार का रवैया गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई शुरू की है।
जांच समिति गठित, निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध
कोर्ट ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को निर्देश दिया है कि वे तत्काल एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित करें और पूरे प्रकरण की विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश करें।
अदालत ने विवादित वन भूमि पर किसी भी प्रकार के नए निर्माण कार्य पर तुरंत रोक लगा दी है।
साथ ही कोर्ट ने साफ कर दिया है कि:
कोई भी निजी व्यक्ति या संस्था इस भूमि पर तीसरा पक्ष नहीं बना सकेगी
न जमीन बेची जा सकेगी, न किराए पर दी जा सकेगी
जिन भूखंडों पर अभी निर्माण नहीं हुआ है, उन्हें वन विभाग तुरंत अपने कब्जे में लेगा
इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी।
2866 एकड़ वन भूमि का गंभीर मामला
पूरा विवाद 2866 एकड़ घोषित वन भूमि से जुड़ा है। आरोप है कि इस सरकारी भूमि का एक हिस्सा ऋषिकेश की एक संस्था पशु लोक सेवा समिति को लीज़ पर दिया गया था। बाद में संस्था बंद हो गई।
साल 1994 में एक लिखित समझौते (सरेंडर डीड) के ज़रिए 594 एकड़ भूमि वन विभाग को वापस सौंप दी गई, जिसे अंतिम और वैध माना गया। वर्षों तक इस पर किसी तरह की कानूनी आपत्ति नहीं उठी।
वर्षों बाद अवैध दावे, प्रशासन की चुप्पी
इसके बावजूद 2001 में कुछ लोग अचानक सामने आए और इस सरकारी वन भूमि पर कब्ज़े का दावा करने लगे। सवाल यह है कि जब संस्था ने ज़मीन सरकार को लौटा दी थी, तो मामला वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था।
लेकिन वर्षों बाद अवैध रूप से ज़मीन पर अधिकार जताया गया और प्रशासन ने समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
अब सुप्रीम कोर्ट की सख़्त दखल के बाद यह साफ है कि वन भूमि पर अवैध कब्ज़ों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, और इस पूरे प्रकरण में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी कटघरे में है।














