राज्यसभा में परमाणु ऊर्जा रूपांतरण विधेयक, 2025 (SHANTI विधेयक) पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने कहा कि वर्ष 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का भारतीय जनता पार्टी ने खुलकर विरोध किया था, जबकि आज उसी समझौते से निकले रास्तों के सहारे सरकार आगे बढ़ रही है।
जयराम रमेश ने कहा कि 2008 में बीजेपी का तर्क था कि परमाणु ऊर्जा का कोई भविष्य नहीं है, इसलिए इस करार का विरोध किया जा रहा है। लेकिन बाद में उसी कानून के चलते भारत और अमेरिका के बीच कई रणनीतिक और तकनीकी रास्ते खुले। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज जो SHANTI विधेयक लाया गया है, उसकी बुनियाद भी वही परमाणु समझौता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार की मंशा पब्लिक सेक्टर को दरकिनार कर निजी क्षेत्र को परमाणु ऊर्जा का मुख्य इंजन बनाने की है, तो यह होमी जहांगीर भाभा और देश के वैज्ञानिकों के दूरदर्शी विजन को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा।
‘2014 से पहले भी देश ने उपलब्धियां हासिल कीं’
जयराम रमेश ने 2014 के बाद की राजनीति का जिक्र करते हुए कहा कि बीजेपी ऐसा माहौल बनाती है मानो देश में स्पेस और परमाणु कार्यक्रमों की शुरुआत 2014 के बाद ही हुई हो, जबकि हकीकत यह है कि इन दोनों क्षेत्रों में ऐतिहासिक प्रगति कांग्रेस शासनकाल में हुई थी।
उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी संसद में कांग्रेस के परमाणु कार्यक्रमों की खुले तौर पर सराहना की थी। ऐसे में मोदी सरकार को अटल जी से सीख लेनी चाहिए और इतिहास को नकारने की बजाय उसे स्वीकार करना चाहिए।
‘राष्ट्रीय संप्रभुता और सार्वजनिक सुरक्षा से समझौता’
जयराम रमेश ने SHANTI विधेयक के तहत एटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1962 और सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010 में संशोधन के प्रस्तावों पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इन बदलावों के जरिए निजी और विदेशी कंपनियों को परमाणु क्षेत्र में प्रवेश दिलाना चाहती है, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा और राष्ट्रीय संप्रभुता पर खतरा पैदा हो सकता है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 2010 का न्यूक्लियर लायबिलिटी कानून बीजेपी नेता अरुण जेटली की सहमति से तैयार हुआ था। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आज बीजेपी उसी कानून और अपने ही वरिष्ठ नेताओं के फैसलों पर सवाल खड़े करना चाहती है?
‘सरकार अपना विजन स्पष्ट करे’
जयराम रमेश ने सरकार से सवाल किया कि आखिर इस विधेयक में संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ी? उन्होंने कहा कि मंत्री ने विकसित भारत के लक्ष्य के तहत 100 गीगावॉट न्यूक्लियर क्षमता की बात कही है, जबकि मौजूदा क्षमता मात्र 8–9 गीगावॉट है।
उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि यह विधेयक परमाणु क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया है और सरकार को इस पर देश के सामने अपना स्पष्ट विजन रखना चाहिए।














