Wednesday, February 11, 2026
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राजस्थान के धर्मांतरण विरोधी कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त — नोटिस जारी, याचिकाएँ टैग कीं

जयपुर/नयी दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने 8 दिसंबर को राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर राजस्थान Rajasthan Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर जवाब मांगा और उस याचिका को उसी विषय से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ टैग कर दिया। बेंच में शामिल थे न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह।

अदालत में दायर मुख्य याचिका Catholic Bishops Conference of India (या Jaipur Catholic Welfare Society जैसी संबंधित याचिकाएँ) ने कोर्ट से आग्रह किया है कि यह कानून अल्ट्रा वायर्स और असंवैधानिक घोषित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की समान याचिकाओं को एक साथ रखकर सुनवाई करने का रुख अपनाया।

कानून में क्या सजा-प्रावधान हैं

राजस्थान के 2025 के इस अधिनियम में कड़े दंडों का प्रावधान है — धोखे से सामूहिक धर्मांतरण के लिए 20 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक, जबकि धोखे/छल से धर्मांतरण पर 7 से 14 वर्ष की सजा बताई गई है। इसके अलावा यदि धोखे से नाबालिग, महिलाएँ, अनुसूचित जाति/जनजाति या दिव्यांगों का धर्मांतरण कराया गया तो 10 से 20 वर्ष तक की सजा और कम-से-कम ₹10 लाख का जुर्माना निर्धारित है।

पहले से चल रही समान सुनवाईयां

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच को बताया कि इसी तरह के कई मामलों में पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ विचाराधीन हैं और इसलिए संबंधित याचिकाओं को साथ में रखकर समग्र सुनवाई करना उचित होगा। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखंड और कर्नाटक समेत कई राज्यों के समान धर्मांतरण विरोधी कानूनों पर जवाब मांगा है और सभी जवाब आने के बाद ही रोक या अन्य आदेशों पर विचार करने का संकेत दिया गया था।

आगे क्या होगा

कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्धारित समय में लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। सभी संबंधित हितधारकों की दलीलों के बाद अगली तारीख पर विस्तृत बहस और सुनवाई तय की जाएगी — जहाँ विधिक और संवैधानिक सवालों (जैसे अनुच्छेद 14, 19, 21, 25 से जुड़े अधिकार, और विधायी अधिकारिता) पर केंद्रित बहस होगी।

सुप्रीम कोर्ट की यह कार्रवाई इस बात की ओर संकेत है कि राज्य स्तर पर पारित ताज़ा धर्मांतरण-प्रतिबंधक कानूनों पर अब शीर्ष अदालत गंभीरता से और समेकित रूप से समीक्षा करेगी — और अगले चरण में दोनों पक्षों के विस्तृत तर्क सामने आएँगे।

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VIKAS TRIPATHI
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