Sunday, February 15, 2026
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शंकराचार्य, सत्ता और संन्यास: माघ मेले के विवाद से उठता धर्म का बड़ा सवाल

प्रयागराज का माघ मेला केवल आस्था का समागम नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की जीवंत तस्वीर है। यहां संगम में स्नान करने लाखों श्रद्धालु आते हैं, साधु-संत, अखाड़े और मठ अपनी-अपनी परंपराओं के साथ उपस्थित रहते हैं। यही कारण है कि माघ मेले से जुड़ी हर घटना केवल स्थानीय नहीं रहती, बल्कि पूरे देश की धार्मिक चेतना को प्रभावित करती है।

इसी माघ मेले में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर प्रशासन और संत समाज के बीच टकराव सामने आया। मौनी अमावस्या के दिन उनकी पालकी रोके जाने, अनुयायियों से पैदल चलने को कहे जाने और अभद्रता के आरोपों ने विवाद को जन्म दिया। जब स्वामी जी धरने पर बैठे, तो प्रशासन द्वारा नोटिस चस्पा किया गया। सबसे गंभीर प्रश्न तब उठा, जब माघ मेला प्रशासन ने ही यह संदेह जता दिया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वास्तव में शंकराचार्य हैं या नहीं।

यह पूरा घटनाक्रम आम जनमानस को एक मूल प्रश्न की ओर ले जाता है—आखिर शंकराचार्य कौन होते हैं? यह पद क्यों और कैसे बना? और सनातन धर्म में इसका वास्तविक महत्व क्या है?

आदिगुरु शंकराचार्य: सनातन चेतना के स्तंभ

सनातन धर्म के इतिहास में आदिगुरु शंकराचार्य का स्थान अत्यंत ऊंचा है। आठवीं शताब्दी में जन्मे शंकराचार्य ने अल्पायु में ही वेद, उपनिषद और ब्रह्मसूत्रों पर असाधारण अधिकार प्राप्त कर लिया था। उन्होंने अद्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया—जिसका सार है कि ब्रह्म और आत्मा में कोई भेद नहीं।

उस समय समाज मत-मतांतरों में बंट रहा था। आदिगुरु शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ, संवाद और यात्रा के माध्यम से यह संदेश दिया कि सत्य एक है, मार्ग अनेक। उनका उद्देश्य धर्म को जोड़ना था, तोड़ना नहीं।

शंकराचार्य, सत्ता और संन्यास: माघ मेले के विवाद से उठता धर्म का बड़ा सवाल

चार मठ और शंकराचार्य परंपरा

सनातन परंपरा को स्थायित्व देने के लिए आदिगुरु शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की—उत्तर में ज्योतिर्मठ, दक्षिण में श्रृंगेरी मठ, पश्चिम में द्वारका शारदा पीठ और पूर्व में गोवर्धन मठ। इन मठों के प्रमुख को शंकराचार्य कहा गया।

ये मठ केवल आश्रम नहीं थे, बल्कि वेदांत की शिक्षा, धर्म की रक्षा और समाज को नैतिक दिशा देने के केंद्र थे। इसलिए शंकराचार्य का पद केवल सम्मान नहीं, बल्कि भारी उत्तरदायित्व का प्रतीक है।

शंकराचार्य पद का महत्व

शंकराचार्य को सनातन धर्म का बौद्धिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना जाता है। उनसे अपेक्षा होती है कि वे केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि धर्म के मूल तत्व—त्याग, विवेक और सत्य—को समाज के सामने रखें। वे सामाजिक और नैतिक प्रश्नों पर भी अपनी बात रखते हैं, लेकिन सत्ता से ऊपर रहकर।

इसी कारण इस पद की गरिमा बनाए रखने के लिए कठोर परंपराएं और मानदंड तय किए गए हैं।

एक श्रेष्ठ संन्यासी की परिभाषा क्या होनी चाहिए?

सनातन परंपरा में संन्यास का अर्थ केवल वस्त्र बदलना नहीं है। एक श्रेष्ठ संन्यासी वह होता है, जिसने मन, वचन और कर्म से संसार का त्याग किया हो।

श्रेष्ठ संन्यासी की पहचान—

जो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से मुक्त हो

जो सत्ता, संपत्ति और प्रतिष्ठा से दूरी बनाए रखे

जो शास्त्रों का गहन ज्ञाता हो, लेकिन अहंकार से रहित हो

जो समाज को जोड़ने का काम करे, न कि विभाजित करने का

जो सत्य बोलने का साहस रखे, चाहे वह सत्ता के विरुद्ध ही क्यों न हो

संन्यासी का जीवन उदाहरण होता है, उपदेश नहीं। उसका आचरण ही उसका सबसे बड़ा शास्त्र होता है।

शंकराचार्य बनने की योग्यताएं

परंपरा के अनुसार शंकराचार्य बनने के लिए व्यक्ति का ब्राह्मण होना, दंडी संन्यासी होना और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य माना गया है। उसे सांसारिक जीवन से पूर्ण विरक्ति, संन्यास संस्कार और कठोर तपस्या से गुजरना होता है।

इसके साथ ही चारों वेद, छह वेदांग, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और संस्कृत भाषा में दक्षता आवश्यक मानी जाती है। शास्त्रार्थ में निपुणता इसलिए जरूरी है, ताकि वह तर्क और विवेक के साथ धर्म की रक्षा कर सके।

शंकराचार्य, सत्ता और संन्यास: माघ मेले के विवाद से उठता धर्म का बड़ा सवाल

चयन प्रक्रिया और काशी विद्वत परिषद

शंकराचार्य का चयन व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता। इसमें अन्य शंकराचार्य, वरिष्ठ संत और विद्वान सम्मिलित होते हैं। काशी विद्वत परिषद इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जहां उम्मीदवार के ज्ञान, आचरण और परंपरागत योग्यता का परीक्षण होता है।

इसी कठोर प्रक्रिया के कारण शंकराचार्य पद से जुड़े विवाद अत्यंत संवेदनशील हो जाते हैं।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का सफर

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने संस्कृत, वेद, उपनिषद और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। 1990 के दशक में उन्होंने संन्यास लिया और लंबे समय तक स्वामी करपात्री जी की सेवा की। 2003 में उन्हें दंड संन्यास की दीक्षा मिली।

सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उन्हें ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित किया गया। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई।

कानूनी और संत समाज का टकराव

उनकी नियुक्ति को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां पट्टाभिषेक पर रोक लगी। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और कई संतों ने प्रक्रिया पर सवाल उठाए। यह विवाद केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि परंपरा, धर्म और कानून के बीच संतुलन का है।

सामाजिक मुद्दों पर मुखर आवाज

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने बयानों के कारण अक्सर चर्चा में रहते हैं। वे राजनीति द्वारा सनातन धर्म के उपयोग पर सवाल उठाते हैं, गौहत्या के मुद्दे पर सरकारों की आलोचना करते हैं, सिंधु जल संधि, केदारनाथ मंदिर और काशी कॉरिडोर जैसे विषयों पर भी मुखर रहे हैं। राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा में शामिल न होने का उनका निर्णय भी शास्त्रसम्मत तर्कों पर आधारित बताया गया।

 विवाद से बड़ा सवाल

माघ मेले का यह विवाद केवल प्रशासन और एक शंकराचार्य के बीच टकराव नहीं है। यह सवाल है कि क्या हम संन्यास और शंकराचार्य जैसे पदों को सत्ता और व्यवस्था की नजर से देखेंगे या परंपरा, त्याग और विवेक की कसौटी पर।

सनातन धर्म की शक्ति उसके संन्यासियों की निस्पृहता में है। जब तक संन्यासी सत्ता से ऊपर रहेगा, तब तक धर्म जीवित रहेगा।

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VIKAS TRIPATHI
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