70 फीट गहरे बेसमेंट में डूबते युवक को बचाने में नाकाम सरकारी तंत्र, सवालों के घेरे में आपदा प्रबंधन और टैक्स के पैसों का इस्तेमाल
उत्तर प्रदेश के नोएडा से सामने आई एक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। 70 फीट गहरे एक मॉल के बेसमेंट में भरे पानी में कार समेत गिरने से 27 वर्षीय इंजीनियर युवराज की दर्दनाक मौत हो गई। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि मौके पर मौजूद सरकारी रेस्क्यू टीम युवक की आंखों के सामने डूबती जान को बचाने में पूरी तरह असहाय नजर आई। रेस्क्यू टीम वहां खड़ी रही, हालात को देखती रही, लेकिन युवराज को बचा नहीं पाई।
इसके ठीक उलट तस्वीर प्रयागराज से सामने आई। यहां वायुसेना का एक ट्रेनी विमान दुर्घटनाग्रस्त होकर तालाब में गिर गया। विमान गिरते ही आसपास मौजूद आम लोग—बिना किसी सरकारी आदेश, बिना किसी औपचारिकता—जान जोखिम में डालकर तालाब में कूद पड़े और दोनों पायलटों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।
इन दो घटनाओं ने एक कड़वा सच सामने रख दिया है—जहां जिम्मेदारी सरकारी सिस्टम की थी, वहां वह फेल हो गया, और जहां कोई जिम्मेदारी नहीं थी, वहां इंसानियत जीत गई।
नोएडा की घटना में सवाल इसलिए और गंभीर हो जाते हैं क्योंकि वहां रेस्क्यू के लिए वे लोग मौजूद थे जिन्हें सरकार वेतन, भत्ते और संसाधन देती है। जिनका काम ही लोगों की जान बचाना है। लेकिन युवराज को बचाने में नाकामी के पीछे जो कारण सामने आए, वे बेहद शर्मनाक हैं।
बताया जा रहा है कि मौके पर पहुंची फायर और रेस्क्यू टीम के कई सदस्यों को तैरना तक नहीं आता था। ठंडे पानी में उतरने से वे डर रहे थे। उनके पास न लाइफ जैकेट थी, न लंबी रस्सी, न सीढ़ी, न फोल्डेबल या इन्फ्लेटेबल बोट। सबसे बड़ा सवाल यह कि उनके भीतर जान बचाने की इच्छाशक्ति तक दिखाई नहीं दी।
यह घटना ऐसे समय में हुई है जब उत्तर प्रदेश में आपदा राहत व्यवस्था के लिए स्टेट डिज़ास्टर रिस्पॉन्स फ़ंड (SDRF) मौजूद है। साल 2023-24 में केंद्र सरकार ने SDRF के लिए 2,956 करोड़ रुपये दिए थे। इनमें से लगभग 1,561 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि करीब 1,400 करोड़ रुपये अब भी बचे हुए हैं।
सवाल उठता है कि जब इतना बड़ा फंड उपलब्ध था, तो नोएडा की रेस्क्यू टीम के पास बुनियादी उपकरण क्यों नहीं थे? क्या इन पैसों से लाइफ जैकेट, इन्फ्लेटेबल बोट या आधुनिक रेस्क्यू उपकरण नहीं खरीदे जा सकते थे? क्या इन्हीं पैसों से जवानों को तैराकी और जल-आपदा से निपटने का प्रशिक्षण नहीं दिया जा सकता था?
और यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि 2023 में यूपी सरकार के एक स्पष्ट सरकारी आदेश में फायर सर्विस के सभी कर्मियों के लिए तैराकी प्रशिक्षण अनिवार्य किया गया था। प्रदेश की ADG पद्मजा चौहान द्वारा सभी CFO, डिप्टी डायरेक्टर और प्रभारियों को निर्देश दिए गए थे कि FSSO, लीडिंग फायरमैन और फायरमैन को तैराकी का प्रशिक्षण दिया जाए।
“पर्दाफाश न्यूज” के पास मौजूद सरकारी पत्र में यह साफ लिखा है, फिर भी नोएडा के फायर जवानों को यह प्रशिक्षण नहीं दिया गया। अगर आदेश का पालन हुआ होता, अगर संसाधन मौके पर होते, तो शायद आज युवराज जिंदा होता।
आपदा और राहत बचाव विभाग में फील्ड जॉब के लिए जिन योग्यताओं की बात की जाती है, उनमें तैराकी, गोताखोरी, पर्वतारोहण और प्राथमिक चिकित्सा जैसी क्षमताएं शामिल हैं। ऐसी योग्यता रखने वालों को प्राथमिकता देने की बात कही जाती है। लेकिन हकीकत यह है कि युवराज को बचाने पहुंची टीम में से किसी को तैरना तक नहीं आता था।
नोएडा की यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं है, यह सरकारी व्यवस्था की संवेदनहीनता, लापरवाही और जवाबदेही के अभाव का आईना है। यह उन हजारों करोड़ रुपये पर सवाल है जो आपदा प्रबंधन के नाम पर खर्च किए जाते हैं।
जब सिस्टम पानी की गहराई और तापमान नापने में उलझा रहा, तब एक 27 साल का युवक मदद के लिए चीखता रहा—और देखते ही देखते हमेशा के लिए खामोश हो गया।














