Supreme Court of India ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों को चुनौती देने वाली एक और याचिका पर सुनवाई करते हुए सख्त रुख अपनाया है। बुधवार को हुई कार्यवाही के दौरान अदालत ने न सिर्फ याचिका की प्रकृति पर सवाल उठाए, बल्कि यह भी संकेत दिया कि न्यायालय को “दोहराव वाली” और “प्रचार-उद्देश्य से दायर” जनहित याचिकाओं से सख्ती से निपटना होगा।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति Surya Kant ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया यह याचिका मीडिया में सुर्खियां बटोरने के उद्देश्य से दायर की गई प्रतीत होती है। उन्होंने याचिकाकर्ता से पूछा कि इस याचिका में ऐसा क्या नया मुद्दा उठाया गया है, जो पहले से लंबित याचिकाओं में शामिल नहीं है।
‘हर मुद्दा PIL नहीं हो सकता’ – अदालत की तल्ख टिप्पणी
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि University Grants Commission (यूजीसी) ने नए नियम बनाते समय अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि नियमों का दायरा और प्रभाव व्यापक है तथा यह उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के सिद्धांत को प्रभावित कर सकता है।
इस पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक नीति या प्रशासनिक निर्णय को स्वतः जनहित याचिका (PIL) का स्वरूप नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि किसी विषय पर पहले से ही सुनवाई चल रही है और न्यायालय अंतरिम आदेश पारित कर चुका है, तो उसी मुद्दे पर अलग-अलग याचिकाएं दायर कर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना उचित नहीं है।
पीठ ने यह भी संकेत दिया कि कुछ मामलों में याचिकाएं वास्तविक जनहित से अधिक सार्वजनिक ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से दायर की जाती हैं, जिसे न्यायालय गंभीरता से लेता है।
जनवरी में अंतरिम रोक: अदालत की पूर्व टिप्पणी
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट जनवरी में ही यूजीसी के इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा चुका है। प्रारंभिक सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा था कि नियम प्रथम दृष्टया अस्पष्ट प्रतीत होते हैं और उनके सामाजिक प्रभाव व्यापक हो सकते हैं।
न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की थी कि नियमों की व्याख्या और क्रियान्वयन में असमानता या भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे संस्थानों में विभाजन की स्थिति बन सकती है। अदालत ने दुरुपयोग की आशंका से भी इनकार नहीं किया था और इस आधार पर नियमों के अमल पर अस्थायी रोक लगाई थी।
विवाद की जड़: ‘गैर-समावेशी’ परिभाषा का आरोप
इन नियमों को लेकर मुख्य विवाद जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर है। आरोप है कि यूजीसी ने भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित कर दिया है।
आलोचकों का कहना है कि इससे कुछ सामाजिक समूह संस्थागत संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकते हैं, जो संविधान के समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
देश के विभिन्न हिस्सों में छात्र संगठनों, शिक्षाविदों और सामाजिक समूहों ने इन नियमों का विरोध किया है और इन्हें वापस लेने या संशोधित करने की मांग की है। उनका तर्क है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव के खिलाफ व्यापक और समावेशी तंत्र होना चाहिए।
संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला बाकी
याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि यदि जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा सीमित दायरे में रखी जाती है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) की भावना के विपरीत हो सकता है।
हालांकि, अदालत ने फिलहाल यह स्पष्ट किया है कि वह समान मुद्दों पर बार-बार दायर की जा रही याचिकाओं को प्रोत्साहित नहीं करेगी। न्यायालय का संकेत है कि वह पहले से लंबित मामलों पर ही समग्र सुनवाई करेगा और उसी के आधार पर अंतिम निर्णय देगा।
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान रुख यह दर्शाता है कि वह न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग या प्रचार-उद्देश्य से दायर याचिकाओं पर अंकुश लगाने के मूड में है। साथ ही, अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि यूजीसी नियमों की संवैधानिक वैधता का प्रश्न गंभीर है और उस पर अंतिम निर्णय विस्तृत सुनवाई के बाद ही लिया जाएगा।
अब निगाहें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि अदालत इन नियमों को लेकर क्या अंतिम रुख अपनाती है—क्या संशोधन का निर्देश दिया जाएगा या नियमों को पूरी तरह निरस्त किया जाएगा।














