Thursday, April 9, 2026
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CEC नियुक्ति कानून पर सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक सुनवाई 6–7 मई को, CJI सूर्यकांत ने खुद को किया अलग

 नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली महत्वपूर्ण याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम सुनवाई के लिए 6 और 7 मई की तारीख तय कर दी है। इस संवेदनशील मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ करेगी।

इससे पहले अदालत ने केंद्र सरकार समेत सभी पक्षकारों को अपने-अपने लिखित पक्ष (written submissions) दाखिल करने का निर्देश दिया था, ताकि अंतिम सुनवाई के दौरान सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जा सके।

CJI ने खुद को क्यों किया अलग?
इस मामले में एक अहम घटनाक्रम तब सामने आया जब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। उन्होंने इसके पीछे “हितों के टकराव” (conflict of interest) का हवाला दिया।
CJI ने स्पष्ट किया कि इस मामले में उनकी भागीदारी पर सवाल उठ सकते हैं, इसलिए पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए उन्होंने खुद को अलग करना उचित समझा। साथ ही उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मामले की सुनवाई ऐसी बेंच को सौंपी जाए, जिसमें शामिल जज भविष्य में CJI बनने की दौड़ में न हों।

क्या है विवाद का मूल मुद्दा?
दरअसल, यह विवाद 2023 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए उस कानून को लेकर है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति की संरचना में बदलाव किया गया है।
नए कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता के साथ एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है, जबकि पहले सुप्रीम कोर्ट के 2023 के संविधान पीठ के फैसले के अनुसार इस समिति में CJI को भी शामिल किया जाना था।

याचिकाओं में क्या कहा गया है?
जनहित याचिकाओं में इस नए कानून को चुनौती देते हुए कहा गया है कि चयन समिति से CJI को हटाना चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को कमजोर करता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे नियुक्ति प्रक्रिया पर कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है।
इन याचिकाओं को जया ठाकुर समेत कई अन्य याचिकाकर्ताओं ने दायर किया है।

अभी तक क्या है स्थिति?
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस कानून पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है। अब 6 और 7 मई को होने वाली अंतिम सुनवाई में इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण कानूनी बहस होने की उम्मीद है, जिसका असर देश की चुनावी प्रणाली और संस्थागत स्वतंत्रता पर दूरगामी हो सकता है।

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VIKAS TRIPATHI
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