कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी ने दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में दायर एक रिवीजन याचिका का जवाब दाखिल करते हुए उस याचिका को “हठात, बेबुनियाद और राजनीति-प्रेरित” बताया है और उसकी खारिज़ी की मांग की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उनका नाम 1980 की न्यू-दिल्ली वोटर-लिस्ट में दर्ज था, जबकि उन्होंने भारतीय नागरिकता अप्रैल 1983 में प्राप्त की थी — और इसके लिए कथित रूप से जाली दस्तावेज़ों का उपयोग हुआ।
सोनिया गांधी की प्रतिक्रिया में कहा गया है कि शिकायतकार ने आरोप लगाने के लिए कोई ठोस दस्तावेज़ या प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए हैं और आरोप पुराने मीडिया-रिपोर्ट्स, अटकलों और काल्पनिक दावों पर आधारित हैं। उनकी ओर से दलील दी गई है कि इस तरह की अपुष्ट और पुरानी शिकायतें कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं और उन्हें स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
न्यायिक पक्ष-स्थिति: रिट-याचिका (रिवीजन) में तर्क दिया गया है कि जिस मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सितंबर 2025 में उनकी शिकायत खारिज की थी, उसने सही तरीके से कहा था कि नागरिकता से जुड़े मामले केवल केन्द्रीय सरकार के दायरे में आते हैं और वोटर-लिस्ट/चुनावी विवादों की देखरेख चुनाव आयोग का काम है — इसलिए सिविल/क्रिमिनल अदालतें सीधे तौर पर ऐसे मुद्दों में दखल नहीं दे सकतीं। निचली अदालत ने यह भी नोट किया था कि शिकायतकर्त्ताओं ने केवल uncertified photocopy जैसे सीमित साक्ष्य पेश किये हैं, जो अपराध के अवयवों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
याचिका किसने और किस आधार पर दायर की? यह रिवीजन याचिका वकील विकास त्रिपाठी द्वारा दायर की गई है, जिसमें उन्होंने मजिस्ट्रेट कोर्ट के सितंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी है जिसमें पहले ही उनकी शिकायत को प्राथमिक पड़ताल पर खारिज कर दिया गया था। पत्राचार में, याचिका में 1980, 1982 और 1983 के चुनावी रिकार्डों में बताए गए प्रविष्ट-परिवर्तनों की व्याख्या माँगी गई है और उस अवधि में इस्तेमाल हुए दस्तावेज़ों की सत्य-निगाह की मांग की गई है।
अगली सुनवाई और प्रक्रियात्मक स्थिति: मामले की आगे की सुनवाई फरवरी में सूचीबद्ध की गई है; पक्षों ने तर्क-तलब और प्रमाणों के संदर्भ में अपना रुख रखा है और सोनिया गांधी की ओर से याचिका को निराधार ठहराने की दलील दी गई है। अदालत-प्रक्रिया के दौरान यह देखा जाएगा कि क्या शिकायत में पेश दावे और साक्ष्य कानूनी मानदंडों पर खरे उतरते हैं या नहीं।
मामले का मूल मुद्दा यही है कि क्या किसी इतिहासगत रिकॉर्ड (वोटर-लिस्ट) के आधार पर चार दशकों पुरानी घटनाओं के लिए आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है — और क्या निचली अदालत ने सही कहा कि ऐसे मामले चुनाव आयोग/केंद्रीय अधिकारियों के अधिकारक्षेत्र में आते हैं। सोनिया गांधी का कहना है कि आरोप बेबुनियाद हैं; शिकायतकर्ता ने जाँच और प्रमाणों की माँग की है — अब फैसला अदालत ही करेगी














