Friday, January 16, 2026
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शाहरुख खान: भाजपा हमला करे, कांग्रेस बचाव करे — और क्रिकेट बलि चढ़े

पिछले कई वर्षों से फिल्म अभिनेता शाहरुख खान भारतीय राजनीति के उस स्थायी पात्र बन चुके हैं, जिन पर हमला करना कुछ दलों के लिए राष्ट्रधर्म है और बचाव करना कुछ के लिए धर्मनिरपेक्ष कर्मकांड। हालात ऐसे हो गए हैं कि कई बार यह संदेह होने लगता है कि शाहरुख खान को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच कोई अलिखित समझौता है—भाजपा हमला करेगी, कांग्रेस बचाव करेगी और जनता तालियाँ बजाती रहेगी। कारण जानने या समझने की जहमत दोनों में से कोई नहीं उठाता।

ताज़ा प्रकरण में स्वामी रामभद्राचार्य ने शाहरुख खान के पूर्ण बहिष्कार का आह्वान कर दिया। आवेश में वे यह भी बोल गए कि शाहरुख खान की पत्नी को भारत में “घुटन” होती है। यह अलग बात है कि “घुटन” वाला बयान शाहरुख की पत्नी ने नहीं, बल्कि आमिर खान की पत्नी ने दिया था। लेकिन जब उद्देश्य तथ्य नहीं, भावनाएँ भड़काना हो तो ऐसी छोटी-छोटी भूलें चल जाती हैं।

कांग्रेस ने तुरंत मोर्चा संभाला और इसे भारत की बहुलतावादी संस्कृति पर हमला घोषित कर दिया। यानी हमला राष्ट्रद्रोह का, बचाव सेक्युलरिज़्म का—पटकथा वही, कलाकार वही, बस संवाद बदल जाते हैं।


मुस्तफिजुर रहमान: बहाना खिलाड़ी का, निशाना शाहरुख का

असल विवाद की जड़ कोलकाता नाइट राइडर्स द्वारा बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिजुर रहमान को 9.2 करोड़ रुपये में खरीदे जाने से जुड़ी है। यह सौदा कुछ हिंदूवादी नेताओं को इतना नागवार गुज़रा कि उन्होंने इसे बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे कथित अत्याचारों से जोड़ दिया।

तर्क यह दिया गया कि जब बांग्लादेश में हिंदुओं के घर जल रहे हैं, तब KKR का बांग्लादेशी खिलाड़ी खरीदना “हिंदुओं को चिढ़ाने” का षड्यंत्र है। और चूंकि KKR के मालिकों में शाहरुख खान भी हैं, इसलिए आग में घी पड़ना तय था। मेरठ की सरधना सीट से पूर्व विधायक संगीत सोम ने तो शाहरुख खान को सीधे-सीधे “गद्दार” ही घोषित कर दिया।

मतलब साफ़ है—एक क्रिकेटर की गेंदबाज़ी नहीं, उसका मज़हब देखा गया; और एक टीम का व्यापारिक फैसला नहीं, उसके मालिक की पहचान।


क्रिकेट प्रेम कभी मज़हब नहीं देखता था

यह आरोप लगाते हुए कि शाहरुख खान ने मुस्तफिजुर को सिर्फ इसलिए लिया क्योंकि वह मुसलमान हैं, आलोचकों ने न केवल शाहरुख बल्कि उस गेंदबाज़ की पूरी प्रतिभा को ही शून्य घोषित कर दिया।

हैरानी यह है कि वही देश, जिसने मंसूर अली खान पटौदी, फारूख इंजीनियर, सैयद किरमानी और मोहम्मद अजहरुद्दीन को सिर-आंखों पर बैठाया; जिसने पाकिस्तान के ज़हीर अब्बास और वसीम अकरम को भी खेल के देवता की तरह पूजा—आज अचानक क्रिकेट में मज़हब खोजने लगा है।

यह ज़हर अचानक आया है, किसी क्रिकेट अकादमी से नहीं बल्कि राजनीति की प्रयोगशाला से।


अजहरुद्दीन: आरोप मज़हब का, मामला फिक्सिंग का

अजहरुद्दीन ऐसे पहले खिलाड़ी थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि उनके साथ मुस्लिम होने के कारण भेदभाव हुआ। लेकिन यह बात तब सामने आई जब उन पर मैच फिक्सिंग के गंभीर आरोप लगे और BCCI ने उन्हें आजीवन प्रतिबंधित कर दिया।

बाद में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2012 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने प्रतिबंध हटा दिया। आज वही अजहरुद्दीन कह रहे हैं कि मुस्तफिजुर रहमान के मामले में BCCI ने सही फैसला लिया। यानी जब फैसला अपने पक्ष में हो तो न्याय, और जब खिलाफ हो तो सांप्रदायिकता।


क्रिकेट: जो कभी खेल था, अब युद्ध है

क्रिकेट कभी जाति, धर्म और मज़हब से ऊपर रहा। भारत ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में क्रिकेट टीमों में हर धर्म और समुदाय के खिलाड़ी रहे हैं। पाकिस्तान में अनिल दलपत और दानिश कनेरिया जैसे हिंदू खेले, यूसुफ योहोना जैसे ईसाई भी।

बांग्लादेश में सौम्य सरकार जैसे हिंदू खिलाड़ी आज भी सम्मानित हैं। लेकिन भारत-पाक और भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में बढ़ती राजनीतिक तल्ख़ी ने क्रिकेट को भी साम्प्रदायिक अखाड़ा बना दिया है।

अब मैच जीतना देश की नहीं, धर्म की जीत मान लिया जाता है। भारत में तो मामला और भी जटिल है—यहाँ क्रिकेट में जाति भी खोज ली जाती है। कोई OBC खिलाड़ी छक्का मारे तो बिरादरी झूम उठती है, जैसे बल्ला नहीं आरक्षण चला हो।


अंग्रेजों का खेल, भारतीय राजनीति का हथियार

यह सच है कि क्रिकेट औपनिवेशिक काल की देन है। 1721 में ईस्ट इंडिया कंपनी के नाविक इसे गुजरात के तट पर लाए। 1932 में भारत ने लॉर्ड्स में पहला टेस्ट खेला। मुंबई इसका केंद्र बना और आज भी है।

1983 के बाद क्रिकेट छोटे शहरों तक पहुँचा और 1990 के बाद सामाजिक बदलावों के साथ इसमें सभी वर्गों की भागीदारी बढ़ी। लेकिन जैसे-जैसे राजनीति ध्रुवीकरण की शिकार हुई, वैसे-वैसे क्रिकेट, सिनेमा और साहित्य भी उसी चक्की में पिसने लगे।


शाहरुख के बहाने सबका एजेंडा

आज हर स्वयंभू हिंदू उद्धारक शाहरुख खान के पीछे पड़ा है। उद्देश्य शाहरुख नहीं, हिंदू–मुस्लिम राजनीति की धार तेज करना है। उधर कांग्रेस शाहरुख के बचाव में इसलिए कूदती है ताकि मुसलमानों में अपनी खोई ज़मीन तलाश सके।

हैरानी यह है कि कांग्रेस स्वामी रामभद्राचार्य या देवकी नंदन ठाकुर के बयानों का विरोध करने के बजाय शाहरुख खान का फेवर कर हिंदुओं को खलनायक साबित करने में लगी है।

सच्चाई यह है कि शाहरुख खान की फिल्में हिंदू दर्शकों के दम पर ही हिट होती हैं। स्वदेश इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।


धर्मगुरु धर्म करें, अदालत देशभक्ति तय करे

स्वामी रामभद्राचार्य, देवकी नंदन ठाकुर और संगीत सोम जैसे नेता यह भूल चुके हैं कि किसी को देशभक्त या गद्दार घोषित करना उनका काम नहीं। इसके लिए अदालतें हैं, जांच एजेंसियां हैं।

लोकतंत्र में बोलने की आज़ादी है, लेकिन किसी को सरेआम प्रमाणपत्र बाँटना उस आज़ादी का दुरुपयोग है। शाहरुख खान KKR के अकेले मालिक नहीं हैं और IPL कोई धर्मसभा नहीं, बल्कि अरबों का व्यापार है।

लेकिन आज के भारत में हर व्यापार, हर खिलाड़ी और हर कलाकार को पहले अपना धर्म-पत्र दिखाना पड़ता है।

और शायद यही असली चिंता है—कि क्रिकेट अब खेल नहीं रहा, राजनीति खेली जा रही है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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