Thursday, April 9, 2026
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सबरीमाला विवाद फिर गरमाया: केंद्र ने महिलाओं के प्रवेश प्रतिबंध का किया समर्थन, 14 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई

केरल के सबरीमाला  मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।सुप्रीम कोर्ट of India की नौ जजों की संविधान पीठ इस संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई कर रही है, जिसकी अगली तारीख 14 अप्रैल तय की गई है।

चीफ जस्टिस जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और संवैधानिक नैतिकता जैसे अहम सवालों पर विचार कर रही है। यह मामला सभी धर्मों में पूजा स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े व्यापक मुद्दों को भी छूता है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने विशेष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध का समर्थन किया। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि 2018 का फैसला गलत आधार पर दिया गया था और इस मामले को केवल जेंडर के नजरिए से नहीं देखा जा सकता।

उन्होंने कहा कि सबरीमाला मंदिर की परंपरा भेदभाव नहीं, बल्कि आस्था और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कई धार्मिक स्थलों पर पुरुषों पर भी विशेष प्रकार के प्रतिबंध या नियम लागू होते हैं, इसलिए इसे एकतरफा लैंगिक भेदभाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

अपने तर्क को मजबूत करने के लिए उन्होंने कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर  का उदाहरण दिया, जहां चामयाविलक्कू उत्सव के दौरान पुरुष महिलाओं के वेश में पूजा करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक परंपराएं विविध और विशिष्ट होती हैं।

यह मामला 2018 के ऐतिहासिक फैसले Indian Young Lawyers Association v. State of Kerala से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था।

बाद में 2019 में, पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पीठ ने इस मुद्दे से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों को व्यापक विचार के लिए बड़ी संविधान पीठ को सौंप दिया था।

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने कहा कि अदालत को सार्वजनिक नैतिकता के बजाय संवैधानिक नैतिकता के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि हालांकि हिंदू धर्म किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं है, लेकिन किसी विशेष मंदिर में दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं को उस मंदिर की परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करना जरूरी होता है।

अब सभी की नजरें 14 अप्रैल को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस बहुचर्चित और संवेदनशील मुद्दे पर अहम दिशा तय होने की उम्मीद है।

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