लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद मतदाता सूची में बड़ा बदलाव सामने आया है। चुनाव आयोग की फाइनल लिस्ट के अनुसार, SIR से पहले जहां प्रदेश में 15.44 करोड़ मतदाता थे, वहीं अब यह संख्या घटकर 13,39,84,792 रह गई है। यानी करीब 2 करोड़ से अधिक नाम सूची से हट गए हैं। यह आंकड़ा 2014 लोकसभा चुनाव के समय की मतदाता संख्या से भी कम बताया जा रहा है, जिसे राजनीतिक हलकों में प्रदेश की वोटर लिस्ट में अब तक की सबसे बड़ी सफाई अभियान के तौर पर देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, SIR के बाद प्रति विधानसभा सीट औसतन 71,647 वोटर कम हो गए हैं। यह गिरावट 2003 के SIR के बाद की सबसे बड़ी मानी जा रही है। उस समय जहां 2002 विधानसभा चुनाव में 9.98 करोड़ मतदाता थे, वहीं 2004 लोकसभा चुनाव तक यह संख्या बढ़कर 11.06 करोड़ पहुंच गई थी। लेकिन इस बार स्थिति उलट गई और वोटरों की संख्या में भारी कमी दर्ज की गई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कटौती का सीधा असर सत्ता पक्ष पर दिख सकता है। बताया जा रहा है कि बीजेपी शासित सीटों पर मतदाताओं की संख्या अधिक घटी है, जबकि सपा की मजबूत मानी जाने वाली सीटों पर असर अपेक्षाकृत कम रहा है। 1 लाख से अधिक वोट कटने वाली 16 सीटों में 15 सीटें बीजेपी के कब्जे वाली बताई जा रही हैं। सिर्फ लखनऊ पश्चिम में सपा को भी बड़ा नुकसान हुआ है, जहां 1.07 लाख वोट घटे हैं।
अयोध्या विधानसभा सीट का उदाहरण खास तौर पर चर्चा में है। 2022 में बीजेपी ने यहां बेहद कम अंतर से जीत दर्ज की थी, जबकि 2024 लोकसभा चुनाव में यह अंतर और भी घटकर 4,600 रह गया था। अब SIR के बाद यहां करीब 80 हजार, यानी 20 प्रतिशत से अधिक वोट कम हो गए हैं। इसी तरह लखनऊ कैंट में भी करीब 1.24 लाख वोट कम हुए हैं, जो लगभग 33 प्रतिशत की गिरावट है।
महिला मतदाताओं की संख्या में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। SIR से पहले जहां 7.21 करोड़ महिला वोटर थीं, अब यह संख्या घटकर 6.09 करोड़ रह गई है। यानी 1.12 करोड़ महिलाओं के नाम सूची से हट गए। वहीं पुरुष मतदाताओं में 93 लाख की कमी बताई जा रही है। इसे राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि कई सीटों पर महिला वोटिंग का असर निर्णायक रहता है।
प्रदेश में मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग और प्रशासन ने कई स्तर पर दावे किए हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने राजनीतिक दलों के साथ 5 बैठकें कीं। सभी दलों ने 5.82 लाख बूथ लेवल एजेंट बनाए। दावा-आपत्ति अवधि में 1.08 लाख शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें 99.80 प्रतिशत का निपटारा कर दिया गया। BLO हेल्पलाइन पर भी 8.63 लाख कॉल आईं, जिनमें 8.33 लाख का समाधान हुआ।
SIR की पूरी प्रक्रिया भी चरणबद्ध तरीके से पूरी की गई। 27 अक्टूबर को कार्यक्रम की घोषणा हुई, 4 नवंबर से 26 दिसंबर तक गणना चरण चला, 6 जनवरी को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी हुई, 6 मार्च तक दावे और आपत्तियां ली गईं, 27 मार्च तक सुनवाई चली और 10 अप्रैल को फाइनल वोटर लिस्ट जारी कर दी गई।
अन्य राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश में कटौती काफी ज्यादा बताई जा रही है। गुजरात में 13.40 प्रतिशत, जबकि यूपी में 13.24 प्रतिशत वोटर कम हुए। इसके अलावा तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी कटौती दर्ज हुई, लेकिन उत्तर प्रदेश को राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील राज्य माना जा रहा है, इसलिए यहां की सूची पर सबकी नजरें टिकी हैं।
बीजेपी के लिए एक और चुनौती यह है कि शहरी और विकसित इलाकों में वोटरों की संख्या ज्यादा घटी है। महानगरों, वेस्ट यूपी-एनसीआर और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भी भारी कटौती देखी गई है। इसके विपरीत मुस्लिम बहुल जिलों में गिरावट तुलनात्मक रूप से कम रही है। संभल, रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जैसे जिलों में मतदाता संख्या में कमी तो आई है, लेकिन शहरी बीजेपी प्रभाव वाले क्षेत्रों की तुलना में यह कम बताई जा रही है।
विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी संगठन SIR प्रक्रिया में उतना सक्रिय नहीं रहा, जितना होना चाहिए था। वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों का कहना है कि विपक्ष, खासकर समाजवादी पार्टी, बूथ स्तर पर अधिक सक्रिय रही और अपने समर्थकों के नाम जुड़वाने में ज्यादा मेहनत की। दूसरी ओर बीजेपी पर संगठनात्मक कमजोरी और आंतरिक कलह के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
इस पूरे मामले पर उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा है कि फाइनल वोटर लिस्ट पूरी पारदर्शिता और नियमों के अनुसार तैयार की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सूची अंतिम नहीं है और यदि कोई वैध मतदाता आवश्यक दस्तावेजों के साथ आगे आता है, तो उसका नाम अभी भी जोड़ा जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम काटने की मंशा नहीं थी और चुनाव आयोग ने यह सूची बिना किसी दुर्भावना के जारी की है।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की नई मतदाता सूची ने प्रदेश की सियासत में हलचल मचा दी है। एक ओर विपक्ष इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल के रूप में देख रहा है, तो दूसरी ओर सत्ता पक्ष इसे पारदर्शी पुनरीक्षण बता रहा है। आने वाले चुनावों में यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।














