लखनऊ के आशियाना सेक्टर एल-91 में 20 फरवरी की सुबह सामने आई एक सनसनीखेज घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। 21 वर्षीय अक्षत प्रताप सिंह उर्फ राजा ने अपने 49 वर्षीय पिता मानवेंद्र सिंह की लाइसेंसी राइफल से गोली मारकर हत्या कर दी। मानवेंद्र सिंह शराब और पैथोलॉजी व्यवसाय से जुड़े थे। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि विवाद की जड़ NEET की तैयारी और करियर को लेकर पिता-पुत्र के बीच बढ़ता तनाव था।
कैसे हुई वारदात?
पुलिस के अनुसार, अक्षत पर पिता की ओर से पढ़ाई को लेकर लगातार दबाव था। उसने NEET की तैयारी दो बार की, लेकिन असफल रहा। वह मेडिकल की बजाय खुद का रेस्टोरेंट व्यवसाय शुरू करना चाहता था, जबकि पिता उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे। घटना से एक रात पहले इसी मुद्दे पर तीखी बहस हुई। अक्षत का दावा है कि गुस्से में पिता ने राइफल तान दी थी, हालांकि बाद में शांत होकर सो गए। तड़के करीब 4:30 बजे अक्षत ने उसी लाइसेंसी राइफल से पिता के सिर में गोली मार दी।
हत्या के बाद उसने शव को तीसरी मंजिल से नीचे उतारा और आरी से काट डाला। हाथ-पैरों को सदरौना जंगल में फेंक दिया, जबकि धड़ को नीले प्लास्टिक ड्रम में भरकर घर में ही छिपा दिया। पुलिस ने घर से 20 लीटर रसायन, आरी, कार और हत्या में प्रयुक्त राइफल बरामद की है। फॉरेंसिक टीम ने मौके से साक्ष्य जुटाए हैं।
बहन को धमकी, गुमशुदगी की झूठी कहानी
अक्षत ने अपनी 16 वर्षीय बहन कृति को जान से मारने की धमकी देकर चार दिन तक घर में बंद रखा। खुद ही पिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई और उनके एक दोस्त को फोन कर आत्महत्या की झूठी कहानी सुनाई। लेकिन पड़ोसियों के CCTV फुटेज, घर से आ रही दुर्गंध और पुलिस की सख्त पूछताछ ने सच्चाई उजागर कर दी। DCP मध्य विक्रांत वीर की टीम के सामने आखिरकार वह टूट गया और अपराध कबूल कर लिया। उस पर हत्या और साक्ष्य मिटाने का मुकदमा दर्ज किया गया है।
समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक पहलू
लखनऊ केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पवन दीक्षित के अनुसार, पिता की हत्या “महापातक” की श्रेणी में आती है। उनका कहना है कि ऐसी घटनाओं के लिए केवल अपराधी ही नहीं, बल्कि समाज भी जिम्मेदार है। आज उपभोग और विलासिता को जीवन का लक्ष्य मानने वाली संस्कृति ने युवाओं को भावनात्मक रूप से अस्थिर बना दिया है। इंद्रियों और मन पर नियंत्रण की कमी, संवादहीनता और बढ़ती अपेक्षाएं ऐसे अपराधों को जन्म दे रही हैं।
प्रो. दीक्षित का सुझाव है कि केवल कानूनी सजा पर्याप्त नहीं है। स्कूलों और कॉलेजों में गीता, उपनिषद, पतंजलि योग, ध्यान, प्राणायाम और भारतीय मनोविज्ञान आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उनका मानना है कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित उपाय, पाश्चात्य काउंसलिंग से अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
बढ़ती घटनाएं चिंता का विषय
यह कोई पहली घटना नहीं है। बीते वर्षों में पढ़ाई, करियर दबाव, पारिवारिक तनाव और नशे की प्रवृत्ति से जुड़ी कई वारदातें सामने आई हैं—जहां बच्चों या किशोरों ने अपने ही परिजनों की हत्या कर दी। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया, मोबाइल गेम्स और “तत्काल सुख” की संस्कृति युवाओं की सहनशक्ति कम कर रही है।
समाधान क्या?
विशेषज्ञों के अनुसार:
अभिभावक बच्चों पर करियर का अत्यधिक दबाव न डालें, संवाद बढ़ाएं।
स्कूलों में भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) और योग-ध्यान की कक्षाएं अनिवार्य हों।
सोशल मीडिया उपयोग पर समय सीमा और जागरूकता अभियान चलें।
संयुक्त परिवार और पारिवारिक मूल्यों को प्रोत्साहन मिले।
लखनऊ की यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक ताने-बाने और युवा मनोविज्ञान पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। यदि समय रहते परिवार, समाज और शिक्षा व्यवस्था ने संतुलित कदम नहीं उठाए, तो ऐसी त्रासद घटनाएं भविष्य में और बढ़ सकती हैं।














