कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद मनीष तिवारी ने संसद के विंटर सेशन में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है, जिसमें उन्होंने मांग की है कि सांसदों को विधेयकों और प्रस्तावों पर वोट करते समय पार्टी व्हिप के दबाव से मुक्त किया जाए। वर्तमान में सांसदों को अपनी पार्टी के औपचारिक निर्देश—यानि ‘व्हिप’—के अनुसार ही मतदान करना अनिवार्य होता है। तिवारी का यह प्रस्ताव एंटी-डिफेक्शन कानून में संशोधन कर इस मजबूरी को समाप्त करने की कोशिश करता है।
चंडीगढ़ से सांसद तिवारी के अनुसार, उनका उद्देश्य सांसदों को “व्हिप-चालित तानाशाही” से मुक्त करना और “अच्छे कानून निर्माण” को प्रोत्साहित करना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट वोट, मनी बिल, स्थगन प्रस्ताव और ऐसे अन्य विषय, जिनका सीधा असर सरकार की स्थिरता पर पड़ता है, इस छूट के दायरे में नहीं आएंगे।
तीसरी बार पेश किया बिल
तिवारी ने कहा कि बिल इस मूल प्रश्न को सामने लाता है कि लोकतंत्र में असली शक्ति किसे मिलनी चाहिए—उस मतदाता को जो धूप में खड़ा होकर वोट देता है, या उस राजनीतिक पार्टी को जिसका व्हिप तय करता है कि सांसद को क्या करना है?
यह एक प्राइवेट मेंबर बिल है, जिन्हें विरले ही मंज़ूरी मिलती है, और तिवारी इसे 2010 और 2021 के बाद तीसरी बार लेकर आए हैं। उनकी यह पहल ऐसे समय में हुई है जब उनकी पार्टी, मुख्य विपक्ष होने के बावजूद, चुनावी चुनौतियों और आंतरिक असंतोष का सामना कर रही है।
तिवारी ने यह भी बताया कि आज कई कानून बिना किसी विस्तृत चर्चा के पारित हो जाते हैं, क्योंकि सांसद स्वयं को कानून बनाने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका में नहीं देखते। उनके अनुसार, अधिकतर विधेयक मंत्रालयों में बैठे किसी संयुक्त सचिव द्वारा तैयार किए जाते हैं, और सदन में मंत्री केवल एक तैयार बयान पढ़ देता है जिसके बाद औपचारिक-सी चर्चा चलती है।
उनका कहना है कि यह बिल संसद और विधानसभाओं में विवेक, जनहित और सामान्य समझ को वापस लाने की कोशिश करता है। यूपीए सरकार में मंत्री रह चुके वरिष्ठ नेता के मुताबिक, व्हिप सांसदों को “सोच-विचार से रहित गिनती के नंबरों” में बदल देता है।














