नई दिल्ली — Institute of Liver and Biliary Sciences (ILBS) में एक महत्वपूर्ण चिकित्सा उपलब्धि दर्ज की गई है। यहां एक किडनी ट्रांसप्लांट पूरी तरह एपिड्यूरल एनेस्थीसिया के तहत सफलतापूर्वक किया गया, जिसमें मरीज सर्जरी के दौरान पूरी तरह जागृत रहा और डॉक्टरों से बातचीत भी करता रहा।
यह जटिल ऑपरेशन ILBS के एनेस्थीसिया विभाग की टीम ने किया, जिसका नेतृत्व Dr. Gaurav Sindwani ने किया। सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम Dr. Abhiyutthan ने दिया।
केस का संक्षिप्त विवरण
42 वर्षीय दिल्ली निवासी पुरुष, जो एंड-स्टेज किडनी डिजीज (ESKD) से पीड़ित थे और लंबे समय से डायलिसिस पर थे, उनका किडनी ट्रांसप्लांट उनकी माता द्वारा दान की गई किडनी से किया गया। सर्जरी के तुरंत बाद प्रत्यारोपित किडनी ने काम करना शुरू कर दिया। ऑपरेशन के बाद मरीज की रिकवरी संतोषजनक और आरामदायक रही।
क्या था इस प्रक्रिया में खास?
सामान्यतः किडनी ट्रांसप्लांट जनरल एनेस्थीसिया के तहत किया जाता है, जिसमें मरीज को बेहोश कर वेंटिलेटर सपोर्ट दिया जाता है।
लेकिन इस विशेष मामले में केवल शरीर के निचले हिस्से को एपिड्यूरल एनेस्थीसिया द्वारा सुन्न किया गया। मरीज पूरी तरह जागृत, सहज और स्थिर रहा। सर्जरी के दौरान या बाद में उसे दर्द का अनुभव नहीं हुआ।

इस तकनीक के प्रमुख फायदे
यह पद्धति विशेष रूप से बुजुर्ग और उच्च जोखिम वाले मरीजों के लिए लाभकारी मानी जा रही है:
1.सर्जरी के दौरान और बाद में प्रभावी दर्द नियंत्रण।
2.छाती संबंधी जटिलताओं (जैसे एटलेक्टेसिस) का कम जोखिम।
3.वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता से बचाव।
4.रक्तचाप का बेहतर नियंत्रण।
5.ERAS (Enhanced Recovery After Surgery) प्रोटोकॉल के अनुरूप तेज़ रिकवरी।
6.ICU और अस्पताल में कुल रहने की अवधि कम होने की संभावना।
विशेषज्ञों की राय
Dr. Gaurav Sindwani ने बताया कि चयनित मरीजों में केवल एपिड्यूरल एनेस्थीसिया के तहत किडनी ट्रांसप्लांट करना एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प हो सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह तकनीक सभी मरीजों के लिए उपयुक्त नहीं है। मरीज की समग्र स्वास्थ्य स्थिति, हृदय और श्वसन संबंधी समस्याओं तथा सर्जिकल जटिलताओं का मूल्यांकन करने के बाद ही यह निर्णय लिया जाना चाहिए।

वर्तमान स्थिति और आगे की संभावनाएं
मरीज की स्थिति स्थिर है और प्रत्यारोपित किडनी तुरंत कार्य कर रही है, जो अत्यंत सकारात्मक संकेत है। ILBS की टीम लगातार पोस्ट-ऑप मॉनिटरिंग और आवश्यक देखभाल कर रही है।
भविष्य में इस तकनीक को और अधिक मामलों में अपनाने की संभावना है, जिसके लिए विस्तृत अध्ययन और वैज्ञानिक मूल्यांकन किए जाएंगे।
यह सफलता ट्रांसप्लांट एनेस्थीसिया के क्षेत्र में एक नया मानक स्थापित कर सकती है, खासकर उन मरीजों के लिए जिनमें जनरल एनेस्थीसिया का जोखिम अधिक होता है। Institute of Liver and Biliary Sciences (ILBS) की यह उपलब्धि आधुनिक चिकित्सा में नवाचार और उत्कृष्ट टीमवर्क का उदाहरण है।














