नई दिल्ली: संसद के बजट सत्र के दौरान निलंबित किए गए विपक्ष के आठ सांसदों को बड़ी राहत मिली है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू द्वारा लोकसभा में पेश प्रस्ताव को सदन ने मंजूरी दे दी, जिसके बाद इन सभी सांसदों का निलंबन वापस ले लिया गया।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 3 फरवरी को सदन की कार्यवाही के दौरान आसन की ओर कागज़ फेंकने और अव्यवस्था फैलाने के आरोप में इन सांसदों को बजट सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया था। निलंबित सांसदों में कांग्रेस के मणिकम टैगोर, अमरिंदर सिंह राजा वडिंग, गुरजीत सिंह औजला, हिबी ईडन, डीन कुरियाकोस, प्रशांत पडोले, किरण कुमार रेड्डी तथा माकपा के एस. वेंकटेशन शामिल थे।
निलंबन के बाद ये सभी सांसद संसद के ‘मकर द्वार’ पर धरना देकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे और लगातार निलंबन वापस लेने की मांग कर रहे थे।
कांग्रेस की अपील के बाद बदला रुख
कांग्रेस ने हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष से इन सांसदों का निलंबन रद्द करने की अपील की थी। पार्टी का कहना था कि सांसदों को सदन से बाहर रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए उचित नहीं है। इसी के बाद सरकार ने इस मुद्दे पर नरमी दिखाई और प्रस्ताव लाकर निलंबन समाप्त किया गया।
‘लक्ष्मण रेखा’ की जरूरत पर जोर
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए मर्यादा बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सभी पक्षों को एक “लक्ष्मण रेखा” का पालन करना चाहिए ताकि संसद की गरिमा बनी रहे।
स्पीकर ओम बिरला ने भी सदस्यों से अपील की कि भविष्य में वे विरोध के दौरान प्लेकार्ड या AI से बनी तस्वीरों का उपयोग न करें और संसदीय परंपराओं का सम्मान करें।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह सकारात्मक कदम है और सदन की गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है।
वहीं कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि यह अच्छा है कि उनके साथी सांसद अब रोज़ाना सीढ़ियों पर बैठकर विरोध करने की स्थिति से बाहर आएंगे और फिर से सदन की कार्यवाही में भाग ले सकेंगे। उन्होंने यह भी माना कि जो भी गलतियां हुईं, उनसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा, लेकिन अब दोनों पक्षों ने बेहतर व्यवहार का आश्वासन दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि टकराव के बाद संवाद और सहमति से समाधान निकाला जा सकता है। सांसदों की वापसी से संसद की कार्यवाही में विपक्ष की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित होगी, जिससे लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूती मिलने की उम्मीद है।














