कार्ति चिदंबरम ने तमिलनाडु को ‘सनातन धर्म’ विरोधी बताने वाले दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि राज्य की धार्मिक आस्था पर सवाल उठाना गलत है। समाचार एजेंसी एएनआई को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु में ‘सनातन’ शब्द को धार्मिक पहचान से अधिक सामाजिक संदर्भ में देखा जाता है, न कि हिंदू धर्म के विरोध के रूप में।
‘सनातन’ शब्द की अलग सामाजिक व्याख्या
कार्ति ने कहा कि तमिलनाडु में ‘सनातन’ शब्द का सामान्य धार्मिक उपयोग कम है। यहां इसे अक्सर जातिगत भेदभाव या ऊंच-नीच की सामाजिक संरचना से जोड़कर देखा जाता है। उनके अनुसार, शब्द की यह अलग व्याख्या ही कई बार विवाद की जड़ बन जाती है।
उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के लोग गहरी व्यक्तिगत और सार्वजनिक आस्था रखते हैं, लेकिन धार्मिक अभिव्यक्ति की शब्दावली उत्तर भारत से अलग हो सकती है।
“हम उत्तर भारतीयों से अधिक हिंदू हैं”
कार्ति चिदंबरम ने जोर देते हुए कहा कि तमिलनाडु के लोग उत्तर भारतीयों की तुलना में कम हिंदू नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रति वर्ग किलोमीटर मंदिरों की संख्या तमिलनाडु में उत्तर भारत से कहीं अधिक है।
उन्होंने कहा कि राज्य में लोग अत्यंत धार्मिक हैं और प्रतिदिन बड़ी संख्या में मंदिरों में नारियल चढ़ाए जाते हैं। कार्ति ने यह भी कहा कि वे स्वयं नियमित रूप से मंदिरों में दर्शन के लिए जाते हैं और “मैं भाजपा के कई लोगों से अधिक मंदिरों में जाता हूं।”
पारिवारिक पृष्ठभूमि और आध्यात्मिक माहौल
कार्ति ने अपने निजी जीवन का जिक्र करते हुए बताया कि वे ऐसे परिवार में पले-बढ़े, जहां उनके दादा-दादी अत्यंत धार्मिक थे। हालांकि उनके माता-पिता धार्मिक नहीं थे, लेकिन घर में आध्यात्मिक माहौल गहरा था।
उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में आध्यात्मिकता की जड़ें बेहद मजबूत हैं और यहां धर्म के पालन पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है। कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि उसे अपने धर्म के पालन से रोका जा रहा है।
उदयनिधि स्टालिन के बयान पर प्रतिक्रिया
साल 2023 में Udhayanidhi Stalin द्वारा ‘सनातन’ की तुलना मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों से किए जाने वाले बयान पर देशभर में विवाद हुआ था। कार्ति ने इस पर कहा कि यह विवाद मुख्य रूप से शब्द की अलग-अलग व्याख्याओं के कारण पैदा हुआ।
उन्होंने संकेत दिया कि मुद्दा धार्मिक आस्था के विरोध का नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की आलोचना से जुड़ा था, जिसे व्यापक राजनीतिक विवाद का रूप दे दिया गया।
‘द्रविड़ मॉडल’ पर उठे सवालों का जवाब
कार्ति चिदंबरम ने उन आरोपों को भी खारिज किया, जिनमें तमिलनाडु के ‘द्रविड़ मॉडल’ को ब्राह्मण विरोधी बताया जाता है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण समुदाय आज भी तमिलनाडु और देशभर में प्रभावशाली और विशेषाधिकार प्राप्त समूहों में शामिल है।
उनके अनुसार, कानून, चिकित्सा, सिनेमा और सरकारी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में ब्राह्मण उच्च पदों पर मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि तमिलनाडु में ब्राह्मणों के खिलाफ न तो कोई हिंसा हो रही है और न ही किसी तरह की ‘नरसंहार’ जैसी स्थिति है।
कार्ति ने कहा कि ब्राह्मणों को अपने रीति-रिवाज और पूजा-पाठ करने से नहीं रोका जाता, इसलिए उन्हें स्वयं को ‘पीड़ित’ बताने की राजनीति से बचना चाहिए।
कार्ति चिदंबरम के इस बयान ने तमिलनाडु में धर्म और राजनीति के संबंधों पर चल रही बहस को नई दिशा दे दी है। उन्होंने स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की कि तमिलनाडु की धार्मिक आस्था को लेकर बनाए जा रहे राजनीतिक नैरेटिव वास्तविकता से परे हैं और राज्य की सामाजिक-सांस्कृतिक समझ को ध्यान में रखे बिना निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।














