नई दिल्ली: Delhi High Court ने Delhi University में एक महीने के लिए सभी प्रकार के विरोध-प्रदर्शनों पर लगाए गए प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए विश्वविद्यालय, Delhi Police और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने मामले को जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई कर रही पीठ को स्थानांतरित कर दिया है। अगली सुनवाई 10 मार्च को निर्धारित की गई है।
क्या है मामला?
यह याचिका DU के लॉ फैकल्टी के छात्र उदय भदौरिया ने दायर की है। याचिका में 17 फरवरी 2026 को विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर कार्यालय द्वारा जारी उस नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई है, जिसके तहत कैंपस और उससे संबद्ध कॉलेजों में सार्वजनिक बैठक, जुलूस, धरना, प्रदर्शन और पाँच या उससे अधिक लोगों के शांतिपूर्ण जमावड़े पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस प्रकार का व्यापक और पूर्ण प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19 (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण एकत्र होने का अधिकार) का उल्लंघन करता है। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार छात्रों का मौलिक अधिकार है, जिसे इस तरह से निलंबित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट की कार्यवाही
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जसमीत सिंह ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए उनका पक्ष जानना जरूरी बताया। बाद में यह मामला चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की अध्यक्षता वाली पीठ को ट्रांसफर कर दिया गया, जो PIL मामलों की सुनवाई कर रही है। अदालत अब यह देखेगी कि विश्वविद्यालय द्वारा लगाया गया प्रतिबंध संवैधानिक मानकों और न्यायिक कसौटियों पर कितना खरा उतरता है।
UGC गाइडलाइंस से शुरू हुआ विवाद
यह प्रतिबंध हाल ही में University Grants Commission (UGC) की इक्विटी गाइडलाइंस को लेकर हुए छात्र आंदोलन के बाद लगाया गया। प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर झड़पें हुईं, जिसके बाद प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए 17 फरवरी से एक महीने के लिए सभी प्रकार की सार्वजनिक गतिविधियों पर रोक लगा दी।
इसके बाद Kirori Mal College और Dayal Singh College ने भी एडवाइजरी जारी कर छात्रों और स्टाफ को चेतावनी दी कि आदेश का उल्लंघन करने पर निलंबन या नौकरी से निष्कासन जैसी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही, सोशल मीडिया पर संबंधित गतिविधियों से जुड़ी सामग्री साझा करने से भी बचने को कहा गया।
प्रशासन का पक्ष
प्रॉक्टर कार्यालय के अनुसार, यह निर्णय हाल के अनुभवों और सुरक्षा एजेंसियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर लिया गया है। आदेश में कहा गया है कि अनियंत्रित सार्वजनिक कार्यक्रमों से ट्रैफिक बाधित होने, आम नागरिकों की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होने और जनशांति भंग होने की आशंका रहती है।
प्रशासन ने यह भी उल्लेख किया कि पूर्व में कुछ मौकों पर आयोजक भीड़ को नियंत्रित करने में असफल रहे, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हुई।
आगे क्या?
अब अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न यह होगा कि क्या सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के नाम पर लगाया गया यह पूर्ण प्रतिबंध संवैधानिक रूप से उचित और आनुपातिक (proportionate) है, या फिर यह छात्रों के मौलिक अधिकारों पर अतिक्रमण करता है।
10 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में अदालत दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर आगे की दिशा तय करेगी। इस मामले का निर्णय न केवल दिल्ली विश्वविद्यालय, बल्कि देश के अन्य विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति और विरोध-प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े व्यापक प्रश्नों को भी प्रभावित कर सकता है।














