लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने कारोबारी निकांत जैन को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता नहीं दिखता।
यह मामला एक प्रस्तावित सोलर मैन्युफैक्चरिंग परियोजना से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि परियोजना की मंजूरी के लिए कुल लागत का 5 प्रतिशत कमीशन मांगा गया। शिकायत के अनुसार यह रकम करीब एक करोड़ रुपये नकद के रूप में मांगी गई थी।
क्या था मामला?
लखनऊ के गोमतीनगर थाने में 20 मार्च 2025 को एफआईआर दर्ज की गई थी। शिकायत एक कंपनी के प्रतिनिधि और बिजनेसमैन विश्वजीत दत्ता द्वारा मुख्यमंत्री को भेजी गई थी। शिकायत में दावा किया गया था कि परियोजना की स्वीकृति दिलाने के नाम पर निकांत जैन ने रिश्वत की मांग की।
मुख्यमंत्री के निर्देश पर मामले की जांच एसटीएफ (STF) को सौंपी गई थी। जांच के बाद 15 मई 2025 को चार्जशीट दाखिल की गई थी।
कोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस राजीव सिंह की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया कि शिकायत गलतफहमी के आधार पर दर्ज कराई गई थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि जांच के दौरान न तो कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किया गया और न ही कथित रिश्वत की कोई बरामदगी हुई।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि अभियुक्त ने किसी लोक सेवक को अनुचित लाभ देने या दिलाने की पेशकश की हो। कमीशन मांगने के आरोपों को अदालत ने पूरी तरह साक्ष्यविहीन बताया।
IAS अधिकारी अभिषेक प्रकाश पर भी असर
इस मामले में आईएएस अधिकारी अभिषेक प्रकाश का नाम भी सामने आया था और वे फिलहाल निलंबित चल रहे हैं। आरोप था कि उन्होंने निकांत जैन के माध्यम से कारोबारी से कमीशन की मांग की थी। केस रद्द होने के बाद अब उनके खिलाफ चल रही कार्रवाई पर भी प्रभाव पड़ सकता है और उनकी बहाली की संभावना बढ़ गई है, हालांकि उनके विरुद्ध विभागीय जांच अभी जारी है।
कानूनी दृष्टि से अहम फैसला
हाई कोर्ट का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि केवल आरोपों के आधार पर किसी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध न हों। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई के लिए प्रथम दृष्टया अपराध बनना अनिवार्य है।
इस निर्णय को कारोबारी वर्ग के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है, वहीं प्रशासनिक हलकों में भी इस पर व्यापक चर्चा हो रही है।














