Monday, March 16, 2026
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13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर AIIMS में चल रही प्रक्रिया, परिवार की आध्यात्मिक आस्था ने कठिन संघर्ष में दिया सहारा

गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा, जो पिछले 13 वर्षों से कोमा की अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं, अब देश में एक ऐतिहासिक मिसाल बनते जा रहे हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी है, जिसके बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ टीम इस प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से पूरा करने में जुटी हुई है।

यह मामला केवल एक व्यक्ति की पीड़ा की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानव गरिमा, चिकित्सा नैतिकता और कानून के बीच संतुलन का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। पूरे देश की नजर इस प्रक्रिया पर टिकी हुई है, क्योंकि यह भारत में इच्छामृत्यु से जुड़े कानूनी और मानवीय पहलुओं पर व्यापक चर्चा को जन्म दे रहा है।


धीरे-धीरे हटाए जा रहे जीवन रक्षक उपकरण

दिल्ली स्थित एम्स अस्पताल में भर्ती हरीश राणा के शरीर से जीवन रक्षक उपकरणों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार डॉक्टरों की एक विशेष चिकित्सा समिति इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रही है।

डॉक्टरों का कहना है कि इस प्रक्रिया में दर्द रहित और गरिमापूर्ण देखभाल को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि मरीज को किसी प्रकार की पीड़ा न हो।

अस्पताल प्रशासन के अनुसार, जब यह पूरी प्रक्रिया संपन्न हो जाएगी तब एम्स के निदेशक की ओर से इसकी आधिकारिक घोषणा की जाएगी। इस घोषणा का इंतजार पूरे देश में संवेदनशीलता और भावुकता के साथ किया जा रहा है।


2013 में हुई दुर्घटना ने बदल दी जिंदगी

हरीश राणा का जीवन साल 2013 में हुए एक दर्दनाक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गया था। उस समय वह पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से जुड़े शैक्षणिक माहौल में पढ़ाई कर रहे थे और अपने भविष्य के सपने देख रहे थे।

बताया जाता है कि वह अपने किराए के आवास की चौथी मंजिल से गिर गए, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई और वे गहरे कोमा में चले गए। उस दुर्घटना के बाद से उनका जीवन पूरी तरह चिकित्सा उपकरणों पर निर्भर हो गया।

डॉक्टरों ने उनके गले में श्वास नली की शल्य प्रक्रिया के माध्यम से एक नली लगाई थी ताकि उन्हें सांस लेने में मदद मिल सके। इसके अलावा उनके पेट में पोषण नली डाली गई थी, जिसके माध्यम से उन्हें तरल भोजन दिया जाता था।

लंबे समय तक चले इलाज और देखभाल के बावजूद उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और चिकित्सा बोर्ड ने हाल ही में यह निष्कर्ष दिया कि उनकी स्थिति अपरिवर्तनीय है और तंत्रिका तंत्र की सामान्य कार्यप्रणाली के लौटने की संभावना नहीं है।


सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला

इस मामले में हरीश राणा के परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह सक्रिय इच्छामृत्यु नहीं है

अदालत ने कहा कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु के तहत केवल खाद्य नली और जीवन रक्षक उपचार को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा, जबकि मरीज को उपशामक देखभाल दी जाती रहेगी, ताकि मृत्यु की प्राकृतिक प्रक्रिया गरिमापूर्ण तरीके से पूरी हो सके

यह फैसला भारत में गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार से जुड़ी बहस में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


परिवार की आध्यात्मिक आस्था बनी सहारा

हरीश राणा के परिवार के करीबी लोगों के अनुसार, उनका परिवार हमेशा से आध्यात्मिकता की ओर झुकाव रखने वाला रहा है।

कोमल नाम की एक करीबी ने बताया कि पिछले 13 वर्षों में इस कठिन परिस्थिति से जूझते समय आध्यात्मिक विश्वास और मार्गदर्शन ने परिवार को मानसिक शक्ति दी।

उन्होंने बताया कि परिवार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए डॉक्टरों की सलाह के साथ-साथ आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी लिया, ताकि वे इस कठिन निर्णय के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर सकें।


माता-पिता की पीड़ा और कठिन निर्णय

हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने पहले कहा था कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति मांगना उनके जीवन का सबसे पीड़ादायक लेकिन जरूरी फैसला था।

उन्होंने कहा था कि उनका मानना है कि यह फैसला सार्वजनिक हित में भी महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि देश में ऐसे कई परिवार हैं जो इसी तरह की परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा था कि यदि इस निर्णय से दूसरे परिवारों को मार्गदर्शन मिल सके, तो यह हरीश की पीड़ा को अर्थ देने जैसा होगा।

आर्थिक संकट से जूझता रहा परिवार

13 वर्षों तक चले इलाज ने हरीश राणा के परिवार को आर्थिक रूप से भी काफी प्रभावित किया। पड़ोसियों के अनुसार, बेटे के इलाज के लिए उनके माता-पिता ने दिल्ली स्थित अपना घर तक बेच दिया था

परिवार ने अपनी जीवन भर की बचत और संसाधनों का बड़ा हिस्सा बेटे की देखभाल और इलाज में लगा दिया।


सरकार और प्रशासन की सहायता

उत्तर प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री के विवेकाधीन राहत कोष से 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता स्वीकृत की है।

इसके अलावा प्रशासन ने परिवार की आजीविका को स्थिर बनाने के लिए एक दुकान निःशुल्क आवंटित करने की घोषणा भी की है।

अधिकारियों के अनुसार, सार्वजनिक सहयोग के माध्यम से 2.5 लाख रुपये की प्रारंभिक सहायता भी परिवार को पहले ही दी जा चुकी है।

गाजियाबाद के जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड़ और नगर आयुक्त विक्रमादित्य मलिक ने भी परिवार से मिलकर उन्हें हर संभव सहायता का आश्वासन दिया है।


अंतिम विदाई का भावुक दृश्य

इस बीच सामाजिक माध्यमों पर एक भावुक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें ब्रह्माकुमारी संस्था की एक गुरु मां हरीश राणा को तिलक लगाकर आध्यात्मिक ढंग से विदाई देती नजर आ रही हैं।

वीडियो में वह उन्हें कहते हुए दिखाई देती हैं कि “सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए जाओ।”

इस दृश्य ने लोगों को बेहद भावुक कर दिया और स्थानीय लोगों के साथ-साथ देशभर से हरीश राणा के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की जा रही है।


समाज और कानून के लिए एक महत्वपूर्ण मामला

हरीश राणा का मामला केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह कानून, चिकित्सा व्यवस्था और मानव गरिमा के बीच संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।

उनकी कहानी ने यह सवाल भी उठाया है कि लंबे समय तक असहनीय चिकित्सा स्थिति में फंसे मरीजों के लिए गरिमा के साथ जीवन और मृत्यु का अधिकार कैसे सुनिश्चित किया जाए।

यह घटना पूरे देश में इच्छामृत्यु, मरीजों के अधिकार और परिवार की पीड़ा को लेकर गंभीर चर्चा का विषय बन गई है।

हरीश राणा का संघर्ष और उनकी जीवन यात्रा भारतीय समाज और न्यायिक व्यवस्था के इतिहास में एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में हमेशा याद की जाएगी।

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VIKAS TRIPATHI
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