नोएडा/लखनऊ पूर्व इंजीनियर यादव सिंह से जुड़े बहुचर्चित मामलों की कड़ी में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। वर्ष 2020 में जारी अंडरग्राउंड केबलिंग टेंडर से संबंधित विद्युत-यांत्रिक प्रकरण में सीबीआई जांच के दौरान जीएम स्तर के एक अधिकारी सहित तीन अधिकारियों के नाम सामने आए हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश शासन ने सख्ती दिखाते हुए नोएडा प्राधिकरण से विस्तृत जांच रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ तैयार आरोप पत्र की प्रतियां तलब की हैं।
सूत्रों के मुताबिक, शासन स्तर से लगभग एक वर्ष पहले ही इस मामले में रिपोर्ट मांगी गई थी। हालांकि, आरोप है कि रिपोर्ट को समय पर लखनऊ नहीं भेजा गया और फाइल लंबित रखी गई। अब शासन द्वारा दोबारा जवाब तलब किए जाने के बाद प्राधिकरण में हड़कंप की स्थिति बताई जा रही है।
क्या है पूरा मामला?
यह प्रकरण वर्ष 2020 में निकाले गए अंडरग्राउंड केबलिंग टेंडर से जुड़ा है। इस परियोजना के तहत नोएडा क्षेत्र में विद्युत लाइनों को भूमिगत करने का कार्य प्रस्तावित था। आरोप हैं कि:
टेंडर प्रक्रिया में निर्धारित मानकों और शर्तों की अनदेखी की गई।
तकनीकी पात्रता और वित्तीय योग्यता के मूल्यांकन में अनियमितताएं बरती गईं।
भुगतान प्रक्रिया में भी कथित गड़बड़ियां हुईं।
कुछ अधिकारियों द्वारा मिलीभगत कर चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया गया।
सीबीआई पहले भी यादव सिंह से जुड़े कई मामलों में चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह मामला उसी नेटवर्क और कार्यशैली की निरंतरता का हिस्सा हो सकता है, जिसकी पड़ताल पहले की जा चुकी है।
शासन की सख्ती और प्रशासनिक देरी पर सवाल
सूत्रों के अनुसार:
शासन ने तीनों नामित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय आरोप पत्र की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
पूर्व में एएफआईआर दर्ज कराने के लिए शिकायत दी गई थी।
विभागीय जांच करीब एक वर्ष तक लंबित रही।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब शासन ने रिपोर्ट पहले ही तलब कर ली थी, तो उसे समय पर क्यों नहीं भेजा गया?
प्रशासनिक हलकों में दो संभावनाओं पर चर्चा है—
1.क्या यह महज लापरवाही और कार्यशैली की शिथिलता थी?
2.या फिर फाइल को जानबूझकर दबाकर संबंधित अधिकारियों को बचाने की कोशिश की गई?
यदि दूसरे विकल्प की पुष्टि होती है, तो यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित न रहकर प्रशासनिक जवाबदेही का भी गंभीर मुद्दा बन सकता है।
‘जूनियर बनाम सीनियर’ का पेचीदा पहलू
मामले का एक संवेदनशील पहलू यह भी सामने आया है कि जांच की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों को सौंपी गई, वे पदक्रम में जूनियर बताए जा रहे हैं।
ऐसी स्थिति में निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि किसी जूनियर अधिकारी के लिए अपने ही वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ कठोर टिप्पणी करना व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कुछ जानकारों ने सुझाव दिया है कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या उच्च स्तरीय समिति को सौंपी जानी चाहिए।
नोएडा प्राधिकरण की साख पर असर
नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण पूर्व में भी टेंडर और भूमि आवंटन से जुड़े विवादों में घिरते रहे हैं। ऐसे में यह प्रकरण कई स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है:
प्रशासनिक पारदर्शिता
वित्तीय अनुशासन
जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया
शासन की भ्रष्टाचार विरोधी नीति
यदि जांच में आरोपों की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों पर निलंबन, विभागीय दंड, सेवा से हटाने या आपराधिक मुकदमा दर्ज किए जाने जैसी कार्रवाई संभव है।
आगे की संभावित कार्रवाई
फिलहाल शासन स्तर पर विस्तृत रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। सीबीआई की जांच और विभागीय जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। साथ ही यह भी संभावना जताई जा रही है कि मामले में अन्य अधिकारियों और संबंधित कंपनियों की भूमिका की भी जांच हो सकती है।
यादव सिंह से जुड़े मामलों ने वर्षों से नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। 2020 के केबलिंग टेंडर प्रकरण में तीन अधिकारियों के नाम सामने आना और एक वर्ष तक रिपोर्ट लंबित रहने का आरोप इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है।
अब निगाहें शासन के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या यह मामला कठोर कार्रवाई का उदाहरण बनेगा, या फिर पूर्व के मामलों की तरह लंबी जांच प्रक्रिया में उलझ कर रह जाएगा—यह आने वाला समय तय करेगा।














