लखनऊ/नोएडा: उत्तर प्रदेश शासन के औद्योगिक विकास अनुभाग-4 से जारी ताजा तबादला आदेशों ने नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) और यूपीसीडा में प्रशासनिक हलचल तेज कर दी है। देर रात जारी इन आदेशों में कई वरिष्ठ अधिकारियों के स्थानांतरण किए गए हैं। हालांकि, पिछले अनुभवों को देखते हुए यह सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या इस बार आदेशों पर तत्काल अमल होगा या फिर फाइलें कागजों तक ही सीमित रह जाएंगी।
किन अधिकारियों का हुआ तबादला?
जारी आदेशों के मुताबिक—
रूप वशिष्ठ को नोएडा प्राधिकरण से यमुना प्राधिकरण में प्रबंधक (सिविल) पद पर भेजा गया है।
प्रदीप कुमार, जो यमुना प्राधिकरण में वरिष्ठ प्रबंधक (सिविल) थे, उन्हें ग्रेटर नोएडा में वरिष्ठ प्रबंधक (सिविल) बनाया गया है।
चेतराम, वरिष्ठ प्रबंधक (सिविल), ग्रेटर नोएडा से यूपीसीडा भेजे गए हैं।
राकेश कुमार, वरिष्ठ प्रबंधक, नोएडा से यूपीसीडा स्थानांतरित हुए हैं।
यशपाल सिंह, प्रबंधक, यमुना प्राधिकरण से नोएडा प्राधिकरण में तैनात किए गए हैं।
सलिल यादव, उपमहाप्रबंधक, यूपीसीडा में ही नई जिम्मेदारी सौंपी गई है।
जितेंद्र कुमार यादव को यमुना प्राधिकरण से नोएडा में तैनाती दी गई है।
इसके अलावा अलग-अलग कार्यालय ज्ञापनों के तहत—
गौरव बंसल, वरिष्ठ प्रबंधक (वित्त/लेखा), नोएडा से YEIDA भेजे गए हैं।
विजय कुमार रावल, उपमहाप्रबंधक (सिविल), नोएडा से यूपीसीडा (कानपुर) में तैनात किए गए हैं।
सतिन्दर गिरी, वरिष्ठ प्रबंधक (सिविल), नोएडा से यूपीसीडा भेजे गए हैं।
सभी आदेशों में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि संबंधित अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त कर नई तैनाती स्थल पर कार्यभार ग्रहण कराने की सूचना शासन को उपलब्ध कराई जाए।
एसआईटी रिपोर्ट और ‘युवराज हादसे’ से जोड़कर भी देखे जा रहे तबादले
सूत्रों के मुताबिक, इन तबादलों को एसआईटी कमेटी की रिपोर्ट पर संभावित कार्रवाई और हालिया चर्चित ‘युवराज हादसे’ की पृष्ठभूमि से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसे नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताया गया है।
लेकिन क्या इस बार होगा तत्काल अमल?
प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि पहले भी इसी प्रकार के तबादला आदेश जारी हुए थे, लेकिन संबंधित अधिकारियों को समय पर कार्यमुक्त न किए जाने के कारण वे पुराने पदों पर ही कार्यरत रहे।
यानी आदेश लखनऊ से निकलते रहे, पर कुर्सियां नोएडा में जस की तस बनी रहीं।
अब बड़ा सवाल यह है—
क्या इस बार कार्यमुक्त करने में देरी नहीं होगी?
क्या पूर्व में आदेशों की अवहेलना पर किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई हुई?
यदि नहीं, तो जवाबदेही किसकी तय होगी?
अब तक सार्वजनिक रूप से किसी दंडात्मक कार्रवाई या स्पष्टीकरण की सूचना सामने नहीं आई है।
आदेशों की स्पीड बनाम कुर्सियों की पकड़
सूत्र बताते हैं कि पहले भी ऐसे ही आदेश निकले थे। फाइलें चलीं, नोटिंग हुई, मुहर लगी… पर कुर्सी वहीं की वहीं। मानो कुर्सी और अधिकारी के बीच कोई “भावनात्मक समझौता” हो—
“जाओ तो सही, पर दिल यहीं रहेगा!”
कुछ जानकार इसे प्रशासनिक “योग साधना” बता रहे हैं—जहां अधिकारी स्थानांतरित तो हो जाते हैं, पर आत्मा पुराने दफ्तर में ही विराजमान रहती है।
शासन की सख्ती या कागजी औपचारिकता?
तबादले प्रशासनिक व्यवस्था का नियमित हिस्सा होते हैं, लेकिन जब आदेशों के बावजूद महीनों तक अमल न हो, तो शासन की सख्ती पर सवाल उठना स्वाभाविक है। शासन की मंशा और जमीनी क्रियान्वयन के बीच का अंतर प्रशासनिक प्रणाली की कार्यप्रणाली पर बहस छेड़ देता है।
व्यंग्यात्मक लहजे में प्रशासनिक हलकों में चर्चा है—
“तबादला आदेश भले जारी हो जाए, लेकिन कुर्सी से रिश्ता इतना मजबूत कि अलग होने का नाम ही न ले!”
अब नजर अमल पर
फिलहाल सभी प्राधिकरणों को तत्काल कार्यमुक्त करने के निर्देश दिए गए हैं। अब देखना यह होगा कि अधिकारी वास्तव में नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करते हैं या फिर फाइलों की आवाजाही के बीच आदेशों का असर धीमा पड़ जाता है।
प्रशासनिक हलकों में माहौल गर्म है और सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस बार शासन की हनक जमीनी स्तर पर दिखती है या नहीं।














