नया फैसला क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने UGC के Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया पाया कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इसलिए दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह नियमों की भाषा और संरचना की समीक्षा करे और इसकी जांच के लिए प्रतिष्ठित विशेषज्ञों की एक समिति गठित करे। तब तक 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे। अगली सुनवाई 19 मार्च, 2026 को निर्धारित की गई है।
टाइमलाइन — नियम कैसे बने और प्रक्रिया क्या रही
27 फ़रवरी 2025: UGC ने नियमों का मसौदा सार्वजनिक किया और आम सुझाव माँगे।
13 जनवरी 2026: UGC ने अंतिम अधिसूचना जारी कर नियमों को औपचारिक रूप दे दिया।
15 जनवरी 2026: इन नियमों को लागू किया जाना था (UGC के नोटिफिकेशन के अनुरूप)।
जनहित याचिकाओं (PILs): नियमों के खिलाफ छात्र-समूहों/याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौतियाँ दाखिल कीं — सुनवाई के बाद कोर्ट ने 2026 नियमों पर रोक लगा दी। (नोट: पहले से भी 2012 मामलों पर याचिकाएँ लंबित थीं।)
नियमों के मुख्य प्रावधान (संक्षेप में)
(UGC के अधिसूचना/मसौदे के सार के अनुसार)
हर उच्च शिक्षा संस्थान में Equal Opportunity Centre (समान अवसर केंद्र) स्थापित करना होगा।
संस्थान के प्रमुख की अध्यक्षता में Equity Committee गठित करना अनिवार्य होगा, जिसमें SC/ST/OBC, महिला और दिव्यांग सदस्य शामिल होंगे।
यह समिति प्रति छह माह सार्वजनिक रिपोर्ट देगी — जिसमें जाति-आधारित ड्रॉप-आउट दरें, प्राप्त शिकायतें और उन पर हुई कार्रवाई का ब्यौरा होगा।
24×7 हेल्पलाइन और हर विभाग/छात्रावास में Equity Squad / Equity Ambassador की व्यवस्था।
किसी भी शिकायत पर 24 घंटे के भीतर समिति की बैठक बुलाने और त्वरित कार्रवाई का प्रावधान।
कार्यवाही पर अपील के लिए स्वतंत्र ओम्बुड्समैन (लोकपाल) का प्रावधान।
नियमों में भेदभाव की परिभाषा विस्तृत की गई — (जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता, जन्मस्थान आदि के आधार पर होने वाला व्यवहार भेदभाव माना गया)।
क्यों लागू किए जा रहे थे ये नियम? (पृष्ठभूमि)
पिछले कई वर्षों में उच्च शिक्षा संस्थानों में दर्ज शिकायतों, जातिगत उत्पीड़न और कुछ मामलों में छात्रों द्वारा आत्महत्या जैसी घटनाओं में वृद्धि देखी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों की जांच और संस्थागत सुधार के निर्देश दिए थे— विशेषकर रोहित वेमुला (2016), पायल तड़वी (2019), IIT-सम्बंधित कुछ दुखद घटनाओं (2023) आदि की पृष्ठभूमि में।
UGC ने कोर्ट को आँकड़े सौंपे, जिनमें पिछले पांच वर्षों में शिकायतों में लगभग 118.4% वृद्धि और लंबित मामलों में 500% तक वृद्धि दर्ज की गई—उसी डेटा को देखते हुए नियमों का मसौदा तैयार किया गया।
सुप्रीम कोर्ट में क्या बहस हुई — प्रमुख बिंदु
सीजेआई सूर्यकांत: प्रथम दृष्टया नियमों की भाषा अस्पष्ट प्रतीत होती है; विशेषज्ञों द्वारा भाषा-संशोधन आवश्यक है ताकि दुरुपयोग न हो।
न्यायमूर्ति बागची: अनुच्छेद 15(4) के तहत आरक्षित/विशेष प्रावधानों की आवश्यकता को स्वीकार किया, पर पूछा कि प्रगतिशील कानून में प्रतिगामी रुख क्यों? अदालत ने विभाजनकारी नीतियों के जोखिम पर भी चिंता जताई।
याचिकाकर्ताओं की दलील — सेक्शन 3C की परिभाषा और उसके प्रभाव को चुनौती दी गई; तर्क दिया गया कि यह प्रावधान संवैधानिक अनुच्छेद 14 (समानता) और 19 के खिलाफ हो सकता है और शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित अलगाव बढ़ाने का जोखिम पैदा करता है।
पक्षकारों ने यह भी उठाया कि ‘सामान्य वर्ग’ के छात्रों के संवैधानिक अधिकार और शिकायत निवारण की उपलब्धता पर भी प्रश्न हैं।
कानूनी पहलू — संवैधानिक विषबिंदु (सार)
अनुच्छेद 14 (समानता): सरकार/नियमों द्वारा किए जाने वाले वर्गीकरण (classification) ‘वाजिब’ और तर्कसंगत होना चाहिए; कोई भी ऐसा प्रावधान जो असंसदीय या मनमाना वर्गीकरण करे, अनुच्छेद 14 के खिलाफ माना जा सकता है।
अनुच्छेद 15(4): राज्य को SC/ST के पक्ष में परिष्कृत/विशेष प्रावधान करने की शक्ति देता है—पर इसकी सीमा व वस्तुनिष्ठ आधार न्यायालय द्वारा परखा जाएगा।
अनुच्छेद 19/विचार-स्वतंत्रताएँ: शिक्षा में नियमों का प्रभाव व्यक्ति की स्वतंत्रता/अवकाश पर किस तरह पड़ेगा, यह भी परखा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का तात्पर्य: नियमों का उद्देश्य/प्रभाव संविधान के समानता नियमन से मेल खाना चाहिए; भाषा अस्पष्ट होने पर सीमाओं और दुरुपयोग की संभावनाओं की समीक्षा जरूरी है।
रोक का अर्थ — क्या बदलेगा संस्थानों में?
तब तक: 2026 के नए नियम लागू नहीं होंगे; 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे — यानी संस्थानों की तत्काल व्यवस्थाएँ और शिकायत निवारण प्रणाली वही होगी जो पहले थी।
संस्थानों के लिए सुझाव: विश्वविद्यालय/कॉलेज 2012 नियमों के अनुरूप अपनी शिकायत निवारण व्यवस्था सक्रिय रखें, शिकायतों का रिकॉर्ड रखें और पारदर्शिता के उपाय अपनाएँ—ताकि छात्रों का विश्वास बना रहे और भविष्य के नियामक बदलावों पर सुगम रूप से समायोजित हो सकें।
भावी रास्ता — क्या होने की संभावना है?
सरकार/UGC को विशेषज्ञों की समिति बनाने का निर्देश दिया गया है; यह समिति नियमों की भाषा, दायरा और कार्यान्वयन के संभावित दुरुपयोगों की जांच करेगी और संशोधनों की सिफारिश करेगी।
अगली सुनवाई 19 मार्च, 2026 को है — तब तक सरकार रिपोर्ट, संशोधित ड्राफ्ट या समिति-रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर सकती है।
संभावित परिणामों में शामिल हैं: नियमों का संशोधित रूप, कुछ धाराओं का सीमित कर देना, या (यदि आवश्यक ठहराया गया) कुछ प्रावधानों का स्थायी रूप से रद्द होना — पर ये सब अदालत व सरकार के चरणों पर निर्भर करेगा।
राजनीतिक व शैक्षणिक प्रतिकिरण (संक्षेप)
नए नियमों का विरोध कुछ राजनीतिक/सामाजिक समूहों ने तेज़ी से राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया — जिससे सार्वजनिक बहस उग्र हुई।
विश्वविद्यालय प्रशासन, छात्र संगठन और मानवाधिकार समूह नियमों के उद्देश्य (भेदभाव रोकना, समावेशी माहौल बनाना) का समर्थन करते हुए भी भाषा-स्पष्टता और प्रक्रिया-सुरक्षा पर जोर दे रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की रोक फैसले ने फिलहाल दोनों तरफ की चिंताओं को एक वैधानिक समीक्षा का मौका दे दिया है।
छात्रों और अभिभावकों के लिए अनुप्रयुक्त सलाह
1.2012 के नियमों एवं संस्थागत शिकायत निवारण प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी रखें।
2.यदि किसी तरह का भेदभाव या उत्पीड़न हो, तो दस्तावेजी साक्ष्य (ईमेल, व्हाट्सऐप, गवाह, रिकॉर्ड) सुरक्षित रखें।
3.संस्थान में शिकायत दर्ज कराएँ और आवश्यक होने पर कानूनी सलाह लें।
4.नियामक-परिवर्तन पर नजदीकी खबर रखें — क्योंकि नियमों के लागू/संशोधित होने पर संस्थागत प्रक्रियाएँ बदली जा सकती हैं।
UGC के 2026 के इक्विटी नियम लक्ष्य तो सामाजिक न्याय, शिकायत निवारण और पारदर्शिता बढ़ाने के हैं—पर सुप्रीम कोर्ट ने आज यही संकेत दिया कि नियमों की भाषा, परिभाषाएँ और कार्यान्वयन-मैकेनिज्म आर्थिक, सामाजिक और संवैधानिक संवेदनशीलताओं के मद्देनज़र स्पष्ट और सीमाबद्ध होने चाहिए। अदालत के निर्देश सरकार को नियमों में परिष्कृत संशोधन करने का अवसर देते हैं ताकि न केवल संरचना बनी रहे बल्कि किसी भी संभावित दुरुपयोग या भेदभाव के आरोपों से भी व्यवस्था सुरक्षित रहे।














