“जब राष्ट्र के पास उपकरण, जीपें और दावे हों पर सुनी हुई चेतावनियाँ — तब एक आदमी की कराह ने दस्तखत कर दिए कि हमारी प्राथमिकता ‘प्रोजेक्ट’ है, ‘प्राणी’ नहीं। चार दिन तक घिरा एक आदमी, और फ़ाइलों में न केवल पानी बल्कि जवाबदेही भी बह गई।”
नोएडा के सेक्टर-150 के पास 70 फ़ीट गहरे बेसमेंट में पकड़ी गई जलभराव-फॉसिलाइज़्ड गलती ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की जान ले ली। बेसमेंट में कार फँसने के बाद युवराज लगभग 40 मिनट तक सनरूफ से बाहर निकलकर सहायता की गुहार लगाते रहे। मदद नहीं पहुँची; चार दिन बाद NDRF ने 7 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद कार निकाली — मगर तब तक देरी ने उसकी जान ले ली। पोस्टमार्टम में पाया गया कि फेफड़ों में करीब 3.30 लीटर पानी भरने से डूबने के साथ कार्डिएक अटैक भी आया।
टीकाटिप्पणी—मामले की पालकी
जिस दिन युवराज “प्लीज़ मुझे बचा लो” कह रहा था, मौके पर मौजूद रेस्क्यू-टीम की रस्सी छोटी पड़ गई। चार दिन बाद वही रस्सियाँ—बंडलों में—जीपों में मिल गईं।
एनडीआरएफ की टीम को घटनास्थल पहुँचने में चार दिन लगे; जब आए तो सात घंटे में कार बाहर निकाली। आख़िर कौन गिनता है उन 40 मिनटों का अर्थ?
नोएडा अथॉरिटी के दावे (पम्प से पानी निकाला जा सकेगा) और जमीन पर हालात का मेल नहीं हुआ—पानी को कहां छोड़ा जाएगा, यह सवाल अनुत्तरित रहा।
2023 में कथित 4.5 करोड़ रुपये की सीवर लाइन बनी बताई गई—पर वह मुख्य ड्रेनेज से जुड़ी ही नहीं थी। यानी कागज़ों में सिस्टम था, धरातल पर सिस्टम नहीं।
घटनाक्रम (पहुंच-आधारित समयरेखा)
युवराज कार में फँसा; 40 मिनट तक सनरूफ से मदद माँगी।
पास के लोग और मौके पर मौजूद व्यवस्थाएँ असमर्थ रहीं।
NDRF मंगलवार दोपहर ~12:00 बजे पहुँचा; दोपहर 1:00 बजे गोताखोर पानी में उतरे।
दोपहर में मैग्नेटिक सेंसर से खोज; कार दो बेसमेंट के बीच मिली।
शाम ~7:00 बजे क्रेन और गोताखोरों की मेहनत के बाद कार निकाली गई।
पोस्टमार्टम में डूबने और फेफड़ों में पानी भरने के साथ कार्डियक अटैक को मौत का कारण बताया गया।
कहाँ-कहाँ चूका सिस्टम (साफ़ और करारी बातें)
1.तुरन्त रिस्पॉन्स नहीं: संसाधन होने का मतलब तात्कालिक उपयोग नहीं—चार दिन बाद NDRF का आना और उस दौरान स्थानीय तंत्र की विफलता शर्मनाक है।
2.गलत दावे और आधे-अधूरे काम: पम्प से पानी निकालने की बात तब बेवकूफ़ी दिखती है जब सीवर लाइन मुख्य ड्रेनेज से जुड़ी ही नहीं थी।
3.डिज़ाइन-विनाश: 90-डिग्री T-पॉइंट और खराब ड्रेनेज ने एक्सरे की तरह तबाही दिखा दी — कोहरे में जानलेवा मोड़।
4.प्रोजेक्ट बनाम प्रस्थापन: फाइलों में बनी सिस्टम रिपोर्टें जमीन पर काम नहीं आईं—यानी ‘फाइलिंग’ को असली सुरक्षा समझ लिया गया।
5.जिम्मेदारी का बंटवारा: कई एजेंसियाँ, कई दावे, मगर ज़िम्मेदारी बाँटकर कोई भी कार्रवाई त्वरित बचाव सुनिश्चित नहीं कर सका।
लोकतांत्रिक सवाल (जो जवाब माँगते हैं)
क्या चार दिन का अंतराल मानवीय जीवन के साथ सही ठहराया जा सकता है?
जो सीवर लाइन 4.5 करोड़ में बनी बताई गई—उसका असली कनेक्शन कहाँ गया?
क्या केवल एक CEO को हटाना पर्याप्त होगा, या सिस्टम के उन नियोजकों, निरीक्षकों और फाइल-परिकल्पकों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी जिनकी चुप्पी ने यह क्रिया संभव की?
अगर पम्प से पानी निकालने की बात सच होती तो उसे कहाँ छोड़ा जाता—क्या किसी ने यह सोचा भी था?
हमारे पास मैनपावर, जीपें और रस्सियों के बंडल थे—पर वक्त और विकल्प नहीं थे। सिस्टम ने साबित कर दिया कि वह प्रोजेक्ट का बोलबाला तो रखता है, पर प्राणी का नहीं। आज एक इंजीनियर की जान गई; कल किसकी लगेगी—जब तक कागज़ों में “सुरक्षा” लिखी रहेगी और जमीन पर वह कागज़ सिर्फ़ धूल बनकर बिखरेगा।
मांग साफ है: त्वरित, पारदर्शी एफआईआर, पूरी टेक्निकल ऑडिट और उन सबके खिलाफ कड़ी कार्रवाई जो ‘विकास’ के नाम पर जीवन बेच रहे हैं।














