नोएडा — सेक्टर-150 में हुए घातक हादसे पर गठित विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल एक तकनीकी चूक या ‘एक-एक घटना’ नहीं थी। जांच ने पुलिस, जिला प्रशासन, नोएडा प्राधिकरण और संबंधित इंजीनियरिंग/मेंटेनेंस इकाइयों में फैलती हुई लापरवाही, समन्वयहीनता और जिम्मेदारी टालने की प्रवृत्ति को उजागर किया है। रिपोर्ट में कुल 12 अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध बताई गई है तथा उनके खिलाफ प्रशासनिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
घटनाक्रम और समयरेखा — चेतावनियों से अनदेखी तक
पूर्व संकेत: जांच में पाया गया कि जिस क्षेत्र में हादसा हुआ, वहां पहले से सुरक्षा, जल-निकासी और सड़क संरचना से जुड़े तकनीकी खतरे मौजूद थे। संबंधित विभागों के पास इन खतरों के संकेतात्मक रपटें/नोट्स मौजूद थे।
क्रियात्मक निष्क्रियता: बावजूद इसके, समय पर न तो निरीक्षण किया गया और न ही निवारक कदम उठाए गए। यह निष्कर्ष दर्शाता है कि चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
प्रतिक्रिया में देरी: हादसे के बाद जो सक्रियता देखी गई, वह लगभग 12 दिन बाद आई—यह देरी आपात प्रबंधन तंत्र की सुस्ती और असंगठित प्रकृति की तरफ इशारा करती है।
दोषारोपण का खेल — विभागों के बीच जिम्मेदारी टालना
एसआईटी रिपोर्ट में यह भी रेखांकित है कि जांच शुरू होते ही विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगे:
जिला प्रशासन ने प्राधिकरण को जिम्मेदार ठहराया;
प्राधिकरण ने रखरखाव एजेंसी तथा कॉन्ट्रैक्टर्स पर आरोप लगाए;
पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था की कमी का जिक्र किया।
इस तरह की बातचीत और बयानबाजी ने दोषमुक्ति की प्रवृत्ति को बढ़ाया और वास्तविक जवाबदेही की राह कठिन कर दी।
किन अधिकारियों पर शक — और किस तरह की कार्रवाई के प्रस्ताव हैं
रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जिन 12 अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है, वे पुलिस, जिला प्रशासन, नोएडा प्राधिकरण और इंजीनियरिंग/रखरखाव इकाइयों के उच्च या मध्य स्तर के अधिकारी हैं। SIT ने इन मामलों में प्रशासनिक/अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के साथ-साथ संभावित उत्तरदायित्व तय करने के लिए आगे की कानूनी प्रक्रियाओं की सिफारिश भी की है — उदाहरण स्वरूप सेवाओं से निलंबन, विभागीय जांच, या न्यायिक जाँच के लिए प्रयोजनार्थ रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
विशेषज्ञों का विश्लेषण — क्यों यह ‘सिस्टम फेलियर’ है
जांच रिपोर्ट और सामान्य प्रशासनिक सिद्धांतों के आधार पर विशेषज्ञ यह मानते हैं कि—
1.निगरानी और नियमित ऑडिट की कमी — यदि समय-समय पर जाँच और मेंटेनेंस ऑडिट होते तो तकनीकी खामियों की पहचान और सुधार पहले ही हो जाता।
2.इंटर-डिपार्टमेंटल समन्वय का अभाव — आपातकालीन और निवारक कार्यों में विभागों का समन्वय निर्णायक होता है; यहाँ यह कमजोर रहा।
3.रिपोर्टिंग-मैकेनिज़्म का न होना — चेतावनियों के बावजूद कोई प्रभावी रैड-फ्लैग सिस्टम नहीं था जो तत्काल उच्च अधिकारियों को सक्रिय करता।
4.सांस्कृतिक कारण — निर्णय टालने का रुझान, भ्रष्टाचार या रसूख-आधारित संरक्षण भी मामलों को बढ़ा देता है।
नीतिगत और प्रैक्टिकल सुझाव — दोराहा (short-term) व दीर्घकालिक समाधान
त्वरित कदम (Immediate):
संदिग्ध अधिकारियों के प्रति त्वरित विभागीय निलंबन और तफ्तीश;
प्रभावित स्थल का अंतरिम सुरक्षा बैंड और आपातकालीन मेंटेनेंस;
पीड़ितों के लिए राहत पैकेज और पारदर्शी मुआवजा प्रक्रिया।
ढांचागत सुधार (Structural):
सभी शहरी सार्वजनिक-इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए नियमित, तृतीय-पक्ष ऑडिट अनिवार्य करना;
चेतावनी/जोखिम रिपोर्टिंग के लिए डिजिटल रेड-फ्लैग सिस्टम (SLA-आधारित) लागू करना;
विभागों के बीच एक नियमित समन्वय मंच (quarterly & emergency protocols) और नियंत्रण कक्ष (control room) स्थापित करना;
जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु स्वतंत्र लोकायुक्त/निरीक्षण प्राधिकरण को अधिक शक्ति देना।
संवैधानिक और कानूनी आयाम — जवाबदेही की राह क्या रहेगी?
SIT की सिफारिशों के आधार पर प्रशासनिक कार्रवाई तो सम्भव है, पर यदि अधिकारियों के ऊपर अपराधिक/सख्त देयताएँ लगती हैं तो मामलों का न्यायिकरण भी हो सकता है। सार्वजनिक व हितसंबंधित पक्ष यहाँ जोर दे रहे हैं कि केवल रिपोर्ट तक सीमित न रहकर, वास्तविक और पारदर्शी कार्यवाही होनी चाहिए—न्याय व अवलोकन दोनों हों ताकि भविष्य में निवारक संस्कृति बने।
घटना से सीख और जनविश्वास की कसौटी
यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और नागरिक सुरक्षा प्राथमिकताओं के समक्ष एक महत्वपूर्ण परीक्षण बन चुका है। यदि केवल रिपोर्टें बनती हैं और कार्रवाई सीमित/सतही रहती है तो नागरिकों का सिस्टम पर भरोसा घटेगा। वास्तविक सुधार तब ही संभव है जब सजा-सुधार दोनों साथ चलें: दोषियों को दंड मिले और संरचनात्मक सुधार लागू हों ताकि ऐसी घटनाएँ भविष्य में न घटें।














