ढाका/नई दिल्ली: पड़ोसी देश बांग्लादेश में हाल ही में हुए संसदीय चुनावों के बाद नई सरकार का गठन हो गया है। Tarique Rahman ने 17 फरवरी को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और उनकी कैबिनेट का भी ऐलान किया गया। इस नई कैबिनेट में दो अल्पसंख्यक मंत्रियों को शामिल किए जाने के बाद भारत में सियासी बहस तेज हो गई है।
चुनाव नतीजे और सरकार का गठन
संसदीय चुनावों में Bangladesh Nationalist Party (BNP) के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 212 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके मुख्य प्रतिद्वंद्वी Jamaat-e-Islami के नेतृत्व वाले गठबंधन को 77 सीटें मिलीं। स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और नई सरकार का गठन किया।
अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व: चार सांसद, दो मंत्री
इन चुनावों में अल्पसंख्यक समुदायों के चार उम्मीदवार विजयी हुए, जिनमें दो हिंदू और दो बौद्ध समुदाय से हैं। सभी विजेता BNP के टिकट पर चुनाव जीते।
निताई रॉय चौधरी (हिंदू) को सांस्कृतिक मामलों (Cultural Affairs) का मंत्री बनाया गया है।
दीपेन दीवान (चकमा बौद्ध समुदाय) को चिटगांव हिल ट्रैक्ट्स मामलों (Chittagong Hill Tracts Affairs) का मंत्रालय सौंपा गया है।
इसके अलावा गोयेश्वर चंद्र रॉय (हिंदू) और सचिन प्रू (बौद्ध) भी सांसद चुने गए हैं, हालांकि उन्हें मंत्री पद नहीं मिला।
दीपेन दीवान ने दक्षिण-पूर्वी रंगमती पहाड़ी जिले से जीत दर्ज की, जो चकमा समुदाय का बहुल क्षेत्र माना जाता है।
भारत में उठा प्रतिनिधित्व का सवाल
बांग्लादेश की नई कैबिनेट में अल्पसंख्यकों को जगह मिलने के बाद भारत में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस सांसद तारिक अनवर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब बांग्लादेश अपनी कैबिनेट में दो अल्पसंख्यकों को स्थान दे सकता है, तो भारत में मुस्लिम मंत्रियों की संख्या शून्य क्यों है?
जब बांग्लादेश अपनी कैबिनेट में दो हिंदू अल्पसंख्यकों को स्थान दे सकता है, तो भारत में मुस्लिम मंत्रियों की संख्या शून्य क्यों? क्या यही समावेशी शासन है, प्रधानमंत्री जी?#Bangladesh #CabinetMinisters
— Tariq Anwar (@itariqanwar) February 17, 2026
गौरतलब है कि भारत की मौजूदा केंद्र सरकार में फिलहाल कोई भी मुस्लिम मंत्री शामिल नहीं है। हालांकि, पूर्व में मोदी सरकार में मुख्तार अब्बास नकवी मंत्री पद संभाल चुके हैं।
राजनीतिक निहितार्थ
बांग्लादेश में अल्पसंख्यक मंत्रियों की नियुक्ति को वहां समावेशी प्रतिनिधित्व के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, वहीं भारत में इसे लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस जहां इसे समावेशी शासन का मुद्दा बना रही है, वहीं भाजपा की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
बांग्लादेश की नई सरकार में अल्पसंख्यक समुदायों को प्रतिनिधित्व दिए जाने से वहां की राजनीति में संतुलन और समावेशिता का संदेश देने की कोशिश दिखती है। दूसरी ओर, भारत में मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज होने के संकेत हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा संसद और चुनावी राजनीति में और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।
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