Friday, January 16, 2026
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पश्चिम बंगाल में SIR बना विवाद की जड़: नोटिस के दबाव में तीन बुजुर्गों की मौत, चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष निरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया इन दिनों गहरे विवाद में घिर गई है। जिस प्रक्रिया को मतदाता सूची की शुद्धता के लिए जरूरी बताया गया था, वही अब मानवीय संवेदनाओं, प्रशासनिक संवेदनशीलता और संवैधानिक जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

राज्य के अलग-अलग जिलों से सामने आई घटनाओं ने न केवल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाया है, बल्कि यह भी उजागर किया है कि तकनीकी और प्रशासनिक फैसलों का आम नागरिकों के जीवन पर कितना गहरा असर पड़ सकता है।

तीन जिलों से तीन मौतें, पूरे राज्य में चिंता

बीते दो दिनों में पुरुलिया, हावड़ा और पूर्वी मेदिनीपुर जिलों से आई खबरों ने राज्य को झकझोर दिया है। इन तीनों जिलों में तीन बुजुर्ग नागरिकों की मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि मतदाता सूची से जुड़े नोटिस और सुनवाई की प्रक्रिया के कारण वे गंभीर मानसिक तनाव में थे।

पुरुलिया जिले में 82 वर्षीय दुर्जन माझी को चुनाव आयोग की ओर से सुनवाई का नोटिस भेजा गया था। परिवार के अनुसार, उनका नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में दर्ज था, लेकिन तकनीकी कारणों से चुनाव आयोग की वेबसाइट पर वह नाम दिखाई नहीं दे रहा था। नागरिकता और मतदान अधिकार पर सवाल उठते देख दुर्जन माझी मानसिक रूप से टूट गए और सुनवाई से कुछ घंटे पहले उन्होंने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली।

हावड़ा जिले में 64 वर्षीय जमात अली शेख को नोटिस मिलने के कुछ ही देर बाद तबीयत बिगड़ गई और उनकी मौत हो गई। परिवार का आरोप है कि नोटिस की भाषा और पूरी प्रक्रिया ने उन्हें इस कदर भयभीत कर दिया कि वे मानसिक दबाव सह नहीं सके।

पूर्वी मेदिनीपुर जिले में 75 वर्षीय बिमल शी अपने घर में मृत पाए गए। परिजनों का कहना है कि नोटिस मिलने के बाद से वे लगातार आशंकित और तनावग्रस्त थे।

तकनीकी खामी या प्रशासनिक लापरवाही?

इन घटनाओं के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह सिर्फ तकनीकी त्रुटि थी या फिर प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा।
चुनाव आयोग ने 27 दिसंबर को जारी अधिसूचना में स्वीकार किया था कि करीब 1.3 लाख मतदाताओं के नाम वर्ष 2002 के फिजिकल रिकॉर्ड में तो हैं, लेकिन तकनीकी कारणों से ऑनलाइन डेटाबेस में दिखाई नहीं दे रहे हैं। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि ऐसी गड़बड़ियों में मतदाताओं को सुनवाई के लिए उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है।

इसके बावजूद कई जिलों में बुजुर्ग नागरिकों को नोटिस भेजे गए, जिससे मतदाताओं के बीच भय और भ्रम का माहौल पैदा हो गया।

पीड़ित परिवारों की शिकायत, जवाबदेही की मांग

तीनों मामलों में पीड़ित परिवारों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया है। परिजनों का आरोप है कि डर पैदा करने वाली और अस्पष्ट प्रक्रिया के कारण उनके परिजनों की जान गई।
परिवार एफआईआर दर्ज कराना चाहते हैं, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है।

क्या CEC के खिलाफ FIR संभव है?

अधिकारियों का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ उनके आधिकारिक कार्यों को लेकर एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। कानून के तहत उन्हें अपने पद पर रहते हुए लिए गए निर्णयों के लिए विशेष संरक्षण प्राप्त है।

2023 का कानून क्या कहता है?

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के अनुसार:

चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कार्यों के दौरान लिए गए फैसलों के लिए कानूनी संरक्षण प्राप्त है

उनके खिलाफ न तो दीवानी और न ही आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है

किसी भी आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना हटाया नहीं जा सकता

क्या महाभियोग ही एकमात्र रास्ता है?

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान है।
उनके खिलाफ न तो सीधा मुकदमा चल सकता है और न ही एफआईआर दर्ज हो सकती है। उन्हें हटाने का एकमात्र रास्ता संसद के जरिए महाभियोग है।

हटाने की प्रक्रिया क्या है?

संसद का कोई भी सदस्य आरोपों के साथ प्रस्ताव ला सकता है

लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा सभापति तीन न्यायाधीशों की जांच समिति गठित करते हैं

आरोप सही पाए जाने पर प्रस्ताव संसद में रखा जाता है

लोकसभा और राज्यसभा दोनों में कुल बहुमत और उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है

इसके बाद राष्ट्रपति अंतिम आदेश जारी करते हैं

किन आधारों पर हटाया जा सकता है CEC?

मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल दो आधारों पर हटाया जा सकता है:

1.दुर्व्यवहार, भ्रष्टाचार, पक्षपात, संवैधानिक जिम्मेदारियों का उल्लंघन या राजनीतिक मिलीभगत

2.असमर्थता, यानी शारीरिक या मानसिक रूप से पद का निर्वहन करने में अक्षम होना

केवल किसी निर्णय से असहमति या विचारधारा के मतभेद के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाया नहीं जा सकता।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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