नई दिल्ली: संसद में पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल (रि.) मनोज मुकुंद नरवणे की एक अनपब्लिश्ड किताब को लेकर उठे विवाद के बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर गंभीर आरोप लगाए हैं। राहुल गांधी का कहना है कि सरकार के दबाव में उन्हें संसद में बोलने से रोका जा रहा है, जो न सिर्फ संसदीय परंपराओं का उल्लंघन है, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।
राहुल गांधी ने कहा कि सदन में हर सांसद को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष को जानबूझकर बोलने से रोका जा रहा है। उन्होंने इसे “हमारे लोकतंत्र पर एक धब्बा” बताते हुए दावा किया कि संसद के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब विपक्ष के नेता को सदन में बोलने की अनुमति नहीं दी जा रही।
स्पीकर को लिखे पत्र में क्या कहा राहुल ने?
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को लिखे पत्र में राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान जब उन्होंने एक मैगजीन का जिक्र करना चाहा, तो स्पीकर ने उनसे उस दस्तावेज़ को ऑथेंटिकेट करने को कहा था। अगले दिन, जब उन्होंने अपना भाषण दोबारा शुरू किया, तो उन्होंने उस दस्तावेज़ को औपचारिक रूप से प्रमाणित भी कर दिया।
राहुल ने लिखा कि संसदीय नियमों और परंपराओं के अनुसार, अगर कोई सांसद सदन में किसी दस्तावेज़ का हवाला देता है, तो उसकी सत्यता की जिम्मेदारी लेने के बाद उसे उस पर बोलने की अनुमति दी जाती है। इसके बाद उस मुद्दे पर जवाब देना सरकार का काम होता है, न कि स्पीकर का।
‘मुझे बोलने से रोकना परंपराओं का उल्लंघन’
पत्र में आगे राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें लोकसभा में बोलने से रोकना न केवल संसदीय परंपराओं का उल्लंघन है, बल्कि इससे यह आशंका भी पैदा होती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर विपक्ष की आवाज़ दबाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा राष्ट्रपति के अभिभाषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी और इस पर चर्चा करना विपक्ष के नेता के तौर पर उनका अधिकार और कर्तव्य दोनों है।
लोकतंत्र पर गंभीर सवाल
राहुल गांधी ने स्पीकर से कहा कि सदन के निष्पक्ष संरक्षक के रूप में हर सदस्य—चाहे वह सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का—के अधिकारों की रक्षा करना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। उन्होंने लिखा कि विपक्ष के नेता और सभी सांसदों को बोलने का अधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है।
राहुल ने पत्र के अंत में कहा कि संसदीय इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब सरकार के कहने पर स्पीकर को विपक्ष के नेता को बोलने से रोकना पड़ा है। उन्होंने इसके खिलाफ अपना कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बताया।














