Friday, January 16, 2026
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महाराष्ट्र की राजनीति: जहाँ सिद्धांत छुट्टी पर हैं और सत्ता ओवरटाइम कर रही है

महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों किसी सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं, फर्क बस इतना है कि यहां हर सीन में किरदार बदल जाते हैं और कहानी सत्ता के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है। कभी बीजेपी कांग्रेस से हाथ मिलाती दिखती है, तो कभी ओवैसी की AIMIM के पार्षद बीजेपी–एनसीपी के खेमे में खड़े नजर आते हैं। मतलब साफ है—राजनीति में न दोस्त स्थायी है, न दुश्मन, स्थायी है तो बस कुर्सी।

अंबरनाथ में बीजेपी-कांग्रेस का “अघोषित प्रेम” अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि अकोट में AIMIM के पार्षदों ने बीजेपी और एनसीपी को समर्थन देकर नया राजनीतिक तड़का लगा दिया। विचारधाराएं हैरान हैं, कार्यकर्ता परेशान हैं और मतदाता पूछ रहा है—“भैया, वोट हमने दिया किसे था?”

अकोट में गणित नहीं, जुगाड़ काम आया
अकोट नगर परिषद की 35 सीटों में से 33 पर चुनाव हुआ। बीजेपी 11 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, AIMIM को 5 सीटें मिलीं। सत्ता के लिए 17 पार्षद चाहिए थे, लेकिन जब नंबर पूरे न हों तो राजनीति में ‘नवाचार’ किया जाता है।

बीजेपी ने झटपट ‘अकोट विकास मंच’ नाम का एक नया ब्रांड लॉन्च कर दिया—जिसमें शिंदे सेना, शिवसेना (UBT), एनसीपी (शरद पवार), एनसीपी (अजित पवार), प्रहार जनशक्ति पार्टी और AIMIM के चार बागी पार्षद एक छत के नीचे आ गए। विचारधारा बाहर, विकास अंदर—यही नया स्लोगन लगता है।

कांग्रेस और वंचित बहुजन आघाड़ी को विपक्ष की कुर्सी थमा दी गई और AIMIM? उसके हिस्से में नगर परिषद में अब सिर्फ “एकला चलो रे” बचा है।

AIMIM बोली—हमें पता ही नहीं चला!
दिलचस्प यह है कि AIMIM के प्रदेश नेतृत्व को इस सियासी शादी का कार्ड ही नहीं मिला। पार्टी नेता इम्तियाज़ जलील ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि बीजेपी से गठबंधन का सवाल ही नहीं उठता और अगर किसी स्थानीय नेता ने ऐसा किया है तो कार्रवाई होगी।
यानी पार्षद बोले—“विकास के लिए गए थे”, पार्टी बोली—“ग़लत घर में घुस गए।”

सत्ता सर्वोपरि, सिद्धांत वैकल्पिक
एक तरफ अंबरनाथ, दूसरी तरफ अकोट—महाराष्ट्र में नए-नए सियासी प्रयोग हो रहे हैं। महागठबंधन के भीतर असंतोष उबल रहा है और बाहर सत्ता के लिए वैचारिक सीमाएं ध्वस्त की जा रही हैं।

अब बड़ा सवाल यही है—
क्या ये गठबंधन विकास लाएंगे या सिर्फ यह साबित करेंगे कि महाराष्ट्र की राजनीति में विचारधारा एक चुनावी पोस्टर है, जिसे जरूरत पड़ने पर दीवार से उतार दिया जाता है?

फिलहाल इतना तय है—
यहाँ राजनीति गंभीर कम और रोचक ज़्यादा होती जा रही है,
और मतदाता हर नई सुबह यही सोचता है—
“आज कौन किसके साथ है?”

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VIKAS TRIPATHI
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