नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में बच्चों की कस्टडी, मिलने-जुलने (विज़िटेशन राइट्स) और पेरेंटिंग प्लान को लेकर स्पष्ट और समान गाइडलाइंस बनाने पर विचार कर सकता है। इस संबंध में दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर रजिस्ट्रार जनरल को रिप्रेजेंटेशन देने का निर्देश दिया है।
यह मामला चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीजन बेंच के समक्ष विचाराधीन है। कोर्ट ने कहा कि रिप्रेजेंटेशन मिलने के बाद हाई कोर्ट का प्रशासनिक पक्ष इस विषय पर आगे की कार्रवाई करेगा।
गाइडलाइंस पर बनेगी नीति, स्टेकहोल्डर्स से होगी सलाह
4 फरवरी को प्रारंभिक सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा था कि यदि रिप्रेजेंटेशन दी जाती है, तो रजिस्ट्रार जनरल इस मामले को संबंधित कमेटी या प्राधिकरण के समक्ष रखेंगे। इसके बाद सभी स्टेकहोल्डर्स से परामर्श लेकर यह तय किया जाएगा कि पेरेंटिंग प्लान, कस्टडी और बच्चों तक एक्सेस से जुड़ी नीति बनाई जाए या नहीं।
एकम न्याय फाउंडेशन ने दाखिल की PIL
यह जनहित याचिका एकम न्याय फाउंडेशन द्वारा दायर की गई है, जिसका नेतृत्व पत्रकार दीपिका नारायण भारद्वाज कर रही हैं। यह फाउंडेशन आयुष्मान इनिशिएटिव फॉर चाइल्ड राइट्स के साथ मिलकर काम करता है।
याचिका में कोर्ट से मांग की गई है कि वैवाहिक विवादों में फंसे बच्चों के हितों की रक्षा के लिए पेरेंटिंग प्लान, कस्टडी और विज़िटेशन राइट्स को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाएं।
दिल्ली में नहीं हैं यूनिफॉर्म गाइडलाइंस
याचिका में बताया गया कि RTI के जवाब से यह सामने आया है कि दिल्ली में फिलहाल बच्चों तक एक्सेस और विज़िटेशन को नियंत्रित करने के लिए कोई एक समान गाइडलाइंस मौजूद नहीं हैं, जिससे अलग-अलग मामलों में भिन्न फैसले सामने आते हैं।
कलकत्ता और कर्नाटक HC की गाइडलाइंस को बताया गया मॉडल
NGOs ने कोर्ट को बताया कि कलकत्ता हाई कोर्ट और कर्नाटक हाई कोर्ट पहले ही इस तरह की गाइडलाइंस बना चुके हैं।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने कलकत्ता हाई कोर्ट की गाइडलाइंस को एक मॉडल और स्टैंडर्डाइज्ड कस्टडी फ्रेमवर्क माना है, जिसे अन्य हाई कोर्ट भी अपना सकते हैं।
बच्चों के हित सर्वोपरि
याचिका में जोर दिया गया है कि वैवाहिक विवादों में सबसे अधिक प्रभावित बच्चे होते हैं, ऐसे में उनके मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक हितों को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट, संवेदनशील और समान न्यायिक दिशा-निर्देश बेहद ज़रूरी हैं।














