नई दिल्ली — यौन अपराधों की सुनवाई में न्यायाधीशों के दृष्टिकोण को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से Supreme Court of India ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने National Judicial Academy को विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करने को कहा है, जो यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायिक दृष्टिकोण में करुणा और संवेदनशीलता विकसित करने पर केंद्रित होंगे।
व्यापक रिपोर्ट तैयार करने का आदेश
भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया गया है कि वह एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करे, जिसमें न्यायाधीशों और न्यायिक प्रक्रियाओं में आवश्यक सुधारों के सुझाव शामिल हों। अदालत ने स्पष्ट किया कि समिति पूर्व में न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर किए गए प्रयासों का भी मूल्यांकन करेगी और उनके जमीनी प्रभाव का अध्ययन करेगी।
“अब तक के प्रयासों से अपेक्षित लाभ नहीं”
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant, जस्टिस Joymalya Bagchi और जस्टिस N V Anjaria की पीठ ने 10 फरवरी को पारित आदेश में कहा कि संवैधानिक अदालतों और वैधानिक निकायों द्वारा पहले भी कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन अब तक उनसे अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं।
मंगलवार को अपलोड किए गए आदेश में पीठ ने कहा कि पूर्व प्रयासों और उनके वास्तविक प्रभाव की व्यापक समझ के बिना नए दिशा-निर्देश निर्धारित करने का प्रयास अधूरा रहेगा। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की राय और सुझाव इस प्रक्रिया के लिए अनिवार्य हैं।
भाषाई विविधता और पीड़ितों पर विशेष ध्यान
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करते समय देश की भाषाई विविधता को ध्यान में रखे। अदालत ने कहा कि इन दिशा-निर्देशों के प्राथमिक लाभार्थी पीड़ित और शिकायतकर्ता होंगे, जिनमें अधिकतर बच्चे, कम उम्र की महिलाएं और समाज के संवेदनशील वर्गों के सदस्य शामिल हैं। इसलिए दिशानिर्देश तैयार करते समय उनकी जरूरतों और परिस्थितियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
स्वतः संज्ञान याचिका में आया आदेश
यह निर्देश उस स्वतः संज्ञान याचिका के निपटारे के दौरान दिए गए, जिसमें Allahabad High Court के एक आदेश पर आपत्ति जताई गई थी। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि केवल निजी अंग पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना बलात्कार नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस टिप्पणी को खारिज करते हुए हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि वह इस निष्कर्ष से सहमत नहीं है कि मामले में आरोप केवल ‘तैयारी’ तक सीमित थे और ‘बलात्कार के प्रयास’ की श्रेणी में नहीं आते थे।
न्यायिक प्रणाली में बदलाव की दिशा
अदालत का यह कदम न्यायिक प्रणाली में संवेदनशीलता और जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित समिति प्रभावी दिशा-निर्देश तैयार करती है, तो इससे यौन अपराधों के मामलों की सुनवाई में पीड़ितों के प्रति अधिक मानवीय और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण विकसित हो सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश को न्यायिक सुधार की दिशा में एक अहम पहल के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले समय में न्यायिक प्रशिक्षण और प्रक्रिया दोनों को प्रभावित कर सकता है।














