नोएडा प्राधिकरण में सेवानिवृत्ति अब एक तारीख नहीं, बल्कि बहस का विषय बन चुकी है। वर्क सर्कल-1 के वरिष्ठ प्रबंधक डोरी लाल वर्मा की 30 जनवरी को रिटायरमेंट पार्टी पूरे उत्साह से मना ली गई, लेकिन हैरत की बात यह रही कि 3 फरवरी तक न कुर्सी खाली हुई, न नेमप्लेट उतरी।
प्राधिकरण की परंपरा रही है कि
अधिकारी फाइलों में रिटायर होते हैं,
लेकिन कमरों में अमर बने रहते हैं।
यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले भी कई अधिकारी सेवा-निवृत्ति के बाद ‘प्रशासनिक कृपा’ से ड्यूटी पर उपस्थित पाए गए हैं। कभी कहा जाता है—
“ऑर्डर नहीं आया”
तो कभी—
“एक्सटेंशन की बात चल रही है”
और जब ये कारण खत्म हो जाएँ, तब राजनीतिक आशीर्वाद सबसे मजबूत तर्क बनकर सामने आता है।
सूत्रों के अनुसार, एस्टैब्लिशमेंट और HR विभाग की भूमिका हमेशा की तरह दर्शक दीर्घा तक सीमित रही। न रिकॉर्ड अपडेट, न नामप्लेट हटाने की जहमत—मानो रिटायरमेंट कोई अनचाही घटना हो।
मगर जैसे ही इस पूरे प्रकरण पर खबर चली, प्राधिकरण में अचानक सक्रियता दिखी।
बताया जा रहा है कि “खबर सार्वजनिक होते ही नेमप्लेट हटवा दी गई, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि नोएडा प्राधिकरण में शासन आदेशों से ज्यादा डर खबरों का है।”
@noida_authority में कुर्सी मोह!
वर्क सर्कल-1 के वरिष्ठ प्रबंधक डोरी लाल वर्मा की 30 जनवरी 2026 को विदाई समारोह हो चुकी@myogiadityanathलेकिन 3 फरवरी 2026 को भी नेमप्लेट लगी है
लगातार दफ़्तर में बैठ रहे हैंसवाल: किस आदेश पर?
अगर सेवा-विस्तार है तो सार्वजनिक क्यों नहीं? pic.twitter.com/tBCBqgGtOD— PARDAPHAAS NEWS (@pardaphaas) February 3, 2026
अब सवाल यह है कि—
अगर खबर न चलती, तो क्या रिटायरमेंट लागू होता?
क्या प्राधिकरण में कुर्सी छोड़ने के लिए जनता नहीं, पत्रकार चाहिए?
स्थानीय लोगों का कहना है कि “यह घटना नोएडा प्राधिकरण की उस कार्यशैली का आईना है जहाँ नियमों से ज्यादा रसूख काम करता है और प्रशासनिक अनुशासन केवल कागज़ों में ज़िंदा है।”
यह मामला सिर्फ एक अधिकारी का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जहाँ
सेवानिवृत्ति भी तभी होती है, जब मामला सार्वजनिक हो जाए।
अब देखना यह है कि प्राधिकरण इसे
“मानवीय भूल” कहकर दबाता है
या
सचमुच अपनी कार्यप्रणाली सुधारने का साहस दिखाता है।
क्योंकि सवाल अब सिर्फ नेमप्लेट का नहीं, सिस्टम की नीयत का है।














