ईरान और अमेरिका के बीच टकराव अब पारंपरिक युद्ध के दायरे से बाहर निकल चुका है। न तो आसमान में मिसाइलें दागी जा रही हैं और न ही जमीन पर सैनिक आमने-सामने हैं, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच जंग शुरू हो चुकी है। यह लड़ाई मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) की है—जहां हथियारों की जगह डर, अफवाह, भ्रम और मनोबल तोड़ने की रणनीति अपनाई जा रही है।
अमेरिका का लक्ष्य स्पष्ट बताया जा रहा है—बिना सीधे सैन्य हस्तक्षेप के ईरान में सत्ता परिवर्तन (Regime Change)। इसी उद्देश्य से वॉशिंगटन ने ईरान के खिलाफ मनोवैज्ञानिक दबाव की रणनीति को तेज कर दिया है। इस अभियान की अगुवाई खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं।
अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने तीन दिन पहले अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि अमेरिकी प्रशासन ईरान से निपटने के लिए मनोवैज्ञानिक युद्ध को एक गंभीर विकल्प के रूप में देख रहा है।
क्या होता है मनोवैज्ञानिक युद्ध?
ब्रिटैनिका के अनुसार, मनोवैज्ञानिक युद्ध आधुनिक संघर्षों का एक अहम हथियार है। इसका उद्देश्य दुश्मन देश की सेना या जनता को शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक रूप से कमजोर करना होता है।
इसमें दुश्मन के दिमाग को इस तरह प्रभावित किया जाता है कि वह डर, भ्रम और अविश्वास में घिर जाए और बिना लड़े ही बैकफुट पर चला जाए।
इतिहास में मनोवैज्ञानिक युद्ध का सबसे पहला उल्लेख महान साइरस द्वारा बेबीलोन के खिलाफ किए गए प्रयोगों में मिलता है। बाद में चंगेज खान ने इसी रणनीति का इस्तेमाल कर एशिया के बड़े हिस्से पर कब्जा किया।
आमतौर पर मनोवैज्ञानिक युद्ध तीन तरीकों से लड़ा जाता है—
1.डर और असुरक्षा का माहौल बनाकर
2.गलत सूचना और प्रोपेगेंडा फैलाकर
3.दुश्मन सेना और जनता का मनोबल तोड़कर
अमेरिका के पास इसके लिए विशेष इकाइयां और रणनीतिक टीमें मौजूद हैं, जो सूचना युद्ध और नैरेटिव मैनेजमेंट में माहिर मानी जाती हैं।
ईरान के खिलाफ अमेरिका की रणनीति क्या है?
1.जनता को विद्रोह के लिए उकसाने की कोशिश
14 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बयान में ईरान की जनता से विद्रोह जारी रखने की अपील की। उन्होंने कहा—
“आप संघर्ष जारी रखिए, अमेरिकी मदद जल्द पहुंचेगी।”
हालांकि ट्रंप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह “मदद” किस रूप में होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान में घबराहट और अस्थिरता पैदा करने के लिए दिए जाते हैं, ताकि सरकार कोई बड़ी रणनीतिक गलती कर बैठे और अमेरिका को सीधे युद्ध में उतरने की जरूरत ही न पड़े।
इसी कड़ी में ईरान के पूर्व युवराज रेजा पहेलवी का बयान भी अहम माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने सेना से सरकार के खिलाफ खड़े होने की अपील की है।
2.फेक न्यूज और प्रोपेगेंडा का जाल
अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देश ईरान के खिलाफ सूचना युद्ध को तेज कर चुके हैं। पश्चिमी मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बड़ी मात्रा में पुराने, भ्रामक और फर्जी वीडियो साझा किए जा रहे हैं।
कुछ मीडिया संस्थानों ने बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के ईरान में कथित विद्रोह के दौरान 20 हजार मौतों का दावा तक कर दिया, जिसे तथ्यात्मक रूप से सही नहीं माना जा रहा है।
इसके साथ ही ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को पूरी स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि ईरान की शासन व्यवस्था में आर्थिक और प्रशासनिक फैसलों की जिम्मेदारी राष्ट्रपति की होती है।
गौरतलब है कि 2024 में ईरान की जनता ने आर्थिक संकट और सुधारों के मुद्दे पर सुधारवादी नेता मसूद पेजेशकियन को राष्ट्रपति चुना था।
3.रिवोल्यूशनरी गार्ड का मनोबल तोड़ने की कोशिश
अमेरिका की तीसरी और सबसे अहम रणनीति है—ईरान की ताकत मानी जाने वाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को मानसिक रूप से कमजोर करना।
इसके लिए अमेरिका उन देशों से संपर्क साध रहा है, जिन्होंने अब तक आईआरजीसी को आतंकी संगठन घोषित नहीं किया है।
ब्रिटेन के अखबार टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने ब्रिटेन पर दबाव बनाया है कि वह लंदन से आईआरजीसी को आतंकी संगठन घोषित करे।
इस कदम का उद्देश्य ईरान की सैन्य और सुरक्षा संरचना को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करना है।
ईरान और अमेरिका के बीच यह संघर्ष फिलहाल गोलियों और बमों से नहीं, बल्कि नैरेटिव, सूचना और डर की लड़ाई से लड़ा जा रहा है। अमेरिका की कोशिश है कि बिना युद्ध में उतरे ईरान की सत्ता को अंदर से कमजोर किया जाए।
हालांकि यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह ईरानी जनता, सेना और नेतृत्व की एकजुटता पर निर्भर करेगा।
एक बात साफ है—यह जंग दिखाई नहीं देती, लेकिन इसका असर बेहद गहरा और दूरगामी हो सकता है।














